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रविवार, 24 जनवरी 2010

बसंत --- (डा श्याम गुप्त )

गायें कोयलिया तोता मैना बतकही करें ,
कोपलें लजाईं , कली कली शरमा रही |
झूमें नव पल्लव, चहक रहे खग वृन्द ,
आम्र बृक्ष बौर आये, ऋतु हरषा रही|
नव कलियों पै हैं, भ्रमर दल गूँज रहे,
घूंघट उघार कलियाँ भी मुस्कुरा रहीं |
झांकें अवगुंठन से, नयनों के बाण छोड़ ,
विहंस विहंस , वे मधुप को लुभा रहीं ||


सर फूले सरसिज, विविध विविध रंग,
मधुर मुखर भृंग, बहु स्वर गारहे |
चक्रवाक वक् जल कुक्कुट ओ कलहंस ,
करें कलगान, प्रात गान हैं सुना रहे |
मोर औ मराल,लावा, तीतर चकोर बोलें,
वंदी जन मनहुं, मदन गुण गा रहे |
मदमाते गज बाजि ऊँट, वन गाँव डोलें,
पदचर यूथ ले, मनोज चले आरहे ||


पर्वत शिला पै गिरें, नदी निर्झर शोर करें ,
दुन्दुभी बजाती ज्यों, अनंग अनी आती है |
आये ऋतुराज, फेरी मोहिनी सी सारे जग,
जड़ जीव जंगम मन, प्रीति मदमाती है |
मन जगे आस, प्रीति तृषा मन भरमाये ,
नेह नीति रीति, कण कण सरसाती है |
ऐसी बरसाए प्रीति रीति, ये बसंत ऋतु ,
ऋषि मुनि तप नीति, डोल डोल जाती है ||


लहराए क्यारी क्यारी,सरसों गेहूं की न्यारी,
हरी पीली ओडे साड़ी, भूमि इठलाई है |
पवन सुहानी, सुरभित सी सुखद सखि !
तन मन हुलसे, उमंग मन छाई है |
पुलकि पुलकि उठें, रोम रोम अंग अंग,
अणु अणु प्रीति रीति , मधु ऋतु लाई है |
अंचरा उड़े सखी री,यौवन तरंग उठे,
ऐसी मदमाती सी, बसंत ऋतु आई है ||

( घनाक्षरी छंद )

6 comments:

Mithilesh dubey ने कहा…

पढने के बाद ऐसा लगा मानो सामने सावन झुम रहा हो, बहुत ही उम्दा ।

जय हिन्दू जय भारत ने कहा…

वंसत है ही ऐसा जिधर सब लोग खिचे चलें जाते है, आपकी रचना लजावब रही, आपको बहुत-बहुत बधाई ।

Udan Tashtari ने कहा…

सुन्दर रचना...

Dr. shyam gupta ने कहा…

बसन्तमय गुणी जनों को बासन्ती धन्यवाद ।

neeshoo ने कहा…

बहुत खूब ..........बंसत की हवाएं भी हमको मदहोश कर गयी ।

बेनामी ने कहा…

basant k kavitae padhkar mujhe gulabi sardi m bhi basanti mausam ka ahsas hone laga h...