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शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

आधुनिक जीवनशैली से अभिशप्त हमारी भावी पीढ़ी -- (मिथिलेश दुबे)

आधुनिक जीवनशैली और ऊँची आकांक्षाओं के बोझ तले वय बुरी तरह से पिस रहा है । इसके प्रभाव से किशोर वय व लड़के-लड़कियाँ मूल्यो, नैतिकताओं और वर्जनाओं से उदासीन और लापरवाह होते चले जा रहे हैं । जो मूल्य और मानदंड इन्हे विकसीत और सुदृढ़ करने के लिए आवश्यक होते हैं, उन्ही पर कुठारघात किया जा रहा है। और इसके लिए जिम्मेदार है- आज की तेज रफ्तार भरी जिंदगी, जिसने अभिभावकों-शिक्षकों तथआ इन किशोरों के बीच एक बढा़ फासला खड़ा कर दिया है, एक दूरी पैदा कर दी है । आधुनिकता की आँधी में यह दूरी अमाप दरार में बदलती जा रही है । इसकी भयावह कल्पना से रोंगटे खड़े हो जाते है कि आखिर हम कहाँ जा रहे हैं, हमारी मंजिल कौन सी है, हमारी दशा और दिशा किधर है़ !


किशोर वय अर्थात उम्र की वह दहलीज जो अभी परिपक्व नहीं हुई है , सुदृढ नही हुई है , अभी तो यह एक आकार लेने को है । जीवन का यह संक्रमण काल होता है । उम्र की इस पड़ाव में कुछ भी परिपक्व नहीं होता है, परिपक्वता की ओर होता है। उम्र की इस नाजुक मोड़ पर ऐसा कोई हादसा या गड़बड़ी न होने पाये, इसलिए अभिभावक इस दौरान बड़े प्यार और कुशलता से साथ देख रेख करते हैं । गीली मिट्टी में आसानी से निशान पड़ जाता है, अतः निर्माण के पूर्ण होने तक इसे सुरक्षा के साथ रखा जाता है । इस अनुशासन से उपजे प्रभाव का परिणाम बड़ा ही सकारत्मक होता है । आधुनिक समृद्धि और संपन्नता से बच्चो को खुश रखने की प्रवृत्ति बढी है । माना जाने लगा है कि जीवन में आर्थिक समृद्धि मे सब कुछ पाया और उपलब्द्ध किया जा सकता है । आज जीवन के विकास के लिए आवश्यक अनुशासन व मुल्यों का स्थान अत्याधुणिक साजो-सामान ब्राण्डेड परधान और उन्मुक्त जीवन ने ले लिया है । यहाँ आधुनिक के नाम पर वह सब कुछ है,जो जीवन के मात्र कुछ ही पक्षो को स्पर्श करता हैऔर जो जीवन का मुख्य आधार है जिसके बिना जीवन पंगु बनकर रह जायेगा, उसे घोर अनदेखा और ऊपेक्षित किया जा रहा है । आधुनिकता के इस महाकुंभ में नहीं है तो अभिभावकों और बच्चो के बीच गहरे भावानत्मक सूत्र-संबंध ।

भावनात्मक एंव अपनेपन के अभाव में पल रहे तथाकथित इन उच्च-मध्यम वर्ग के समृद्ध किशोरों के पास महँगे साजो -सामान, परिधान और अत्याधुनिक कम्प्यूटर है, जिन पर वे इंटरनेट के माध्यम से अश्लील साहित्य और चित्रों को देखते हैं , । जिसका उपयोग पढा़ई के लिए होना चाहिए, अनुशासन और मार्गदर्शन के अभाव के कारण में उसका घोर दुरुपयोग हो रहा है ,। आज के सातवें दर्जे के छोटे-छोंटे बच्चे-बच्चियाँ जिन्हे उम्र का एहसास तक नहीं , वरजनाओं और मर्यादाओं की सारी सीमाओं को पिछे छोड़ चुके हैं । स्कूली बच्चों के लिए नैतिकता और मूल्यो के वें अर्थ अब नहीं रह गये हैं , जिनकीउनसे अपेक्षा की जाती है। शराब-सिगरेट पीना, हलकी मादक दवाएँ लेना, चुप-चुप सैर सपाटा, अचानक स्कूल से गायब हो जाना, साइबर कैफे में इंटरनेट पर अश्लिलता से सरोबोर होना और बार आदि में जाना के लिए झूठ बोलना, ऐसे परिधानों का चयन करना, जिन्हे वे घर में भी पहनने का साहस नहीं जूटा नहीं पाते आदि प्रचलन बन गया है । अब स्कूल कें बच्चों व किशोंरी की अभिरुचियों में जो परिवर्तन झलक रहे हैं , उसकि पीडा और दर्द को शब्दो में अभिव्यक्त कर पाना दुष्कर है। स्कूली बच्चों के टिफिन में पूड़ी-भाजी ले जानें तथा अंत्याक्षरी, स्वस्थ मनोरंजन, पिकनिक मनाने में कोई रुचि नहीं दीखती ।

एक आँकडे के अनुसार अपने देश में प्रतिदिन सिगरेट के पहले कश से शुरुआत करने वाले नए किशोरों की संख्या लगभग ३,००० है । मुंबई और दिल्ली में १४-१५ साल की किशोरियाँ सर्वाधिक मात्रा में धूम्रपान की ओर बढ़ रही हैं । स्कूली बच्चों की पार्टिया में शराबखोरी कोई नई बात नहीं रह गयी । संयुंक्त राष्ट्र मादक पदार्थ एंव अपराध (UNODC) ने भारत में मादक पदार्थो के प्रयोग पर सन् २००४ में राष्ट्रिय सर्वेक्षण किया था । जिसमे पाया गया कि युवाओं में नशा सेवन एक सामान्य सी बात है । इस सर्वेक्षण के अनुसार शराब पीने वाले ९ प्रतिशत युवाओं ने १५ साल की उम्र में पहली बार इसका सेवन किया और २८ प्रतिशत ने १६ से २० वर्ष की उम्र में शुरु किया । इसमें यह भी पाया गया कि १८ साल से कम उम्र के किशोरो-किशोरियों में यह आदत बढ़ती जा रही है । यह आँकडा मात्र नशे के क्षेत्र में ही नहीं है, बल्कि तमाम ऐसे नैतिक, सामाजिक शैक्षिक पक्ष है, जहाँ पर किशोर वय ने अपनी सीमाओं का अतिक्रमण किया है । अपनेपन का अभाव एंव अच्छे अंको से उत्तीर्ण होने के दबाव के चलते इनमें मानसिक अवसाद घर करने लगा है । अपने देश में लगभग १२ प्रतिशत बच्चे किसी ब किसी मानसिक विकार व समस्या से ग्रस्त हैं । अब तो चौकांने वाले बात यह है कि मानसिक विकार से ग्रस्त बच्चे आत्महत्या करनें लगे हैं । समय रहते यदि इसे सुधारा-सँवारा नहीं गया तो इसकी तपती आँच हमारे समाज और राष्ट्र को भी छोड़ने वाली नहीं है ।

समस्या बड़ी गंभीर है यह अनियंत्रित होने की स्थिति में है । अच्छा हो इससे योजनाबद्ध तरीके से निपटा जाये । इसके लिए सर्वोपरि आवश्यकता है कि अभिभावकों और बच्चो के बिच बर्फ- सी जमी संवाहीनता एवं संवेदनशीलता को फिर से पिघलाया जाए । अभिवावको की जागरुता बच्चों और किशोरों की तमाम समस्याओं का समाधान के सकती है । किशोरों में उनकी जीवन के प्रति जागरुकता उत्पन्न करने के साथ उन्हे ऐसी शिक्षा भी देनी चाहिए कि वे बड़ो का आदर और सम्मान करें । आधुनिकता कोई बुरी बात नहीं है-बुरी बात है तो बस , इस आँधी में मूल्यों का हास, नैतिकता का पतन, मर्यादाओं का उल्लघंन । आधुनिक जीवनशैली में भी इन मूल्यों को सामयिक ढ़ग से समहित करके अनेक ऊतिरोधों को समाप्त किया जा सकता है । गहरे अपनेपन के आधार पर अभिभावकों और बच्चो के बीच की दूरी और दरार मिटाकर वर्तमान समस्याओं से निजात पाई जा सकती है ।

5 comments:

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…
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डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

विचारणीय आलेख.

Dr. shyam gupta ने कहा…

बहुत सही वर्णन , आधुनिकता के कारण हम सिर नीचे केओर करके हाथों से तो कभी नहीं चले,किसी भी युग में, प्राचीनता के उत्तमगुण न छोडकर नवीनता के समन्वय से चलना ही आधुनिकता है।

Gege Dai ने कहा…


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