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मंगलवार, 5 जनवरी 2010

इन्द्रधनुष ------- ( डा श्याम गुप्त )

सुमि, तुम !
के.जी. ! अहो भाग्य ,क्या तुमने आवाज़ दी ?
नहीं |
मैंने भी नहीं | फिर ?
हरि इच्छा , मैंने कहा |
वही खिलखिलाती हुई उन्मुक्त हंसी |
चलो , वक्त मेहरवान तो क्या करे इंसान | कहाँ जाना है, सुमि ने पूछा |
मुम्बई, 'राशी' की कोंफ्रेंस है |और तुम ?
मुम्बई,पी जी परीक्षा लेने | मेडिकल कालेज के गेस्ट हाउस में ठहरूंगी , और तुम |
मेरीन ड्राइव पर |
सागर तीरे !
नहीं भई, रेस्ट हाउस है ,चर्च गेट पर | चलो तुम्हारे साथ मेरीन ड्राइव पर घूमने का आनंद लेंगे , पुराणी यादें ताजा करेंगे | रमेश कहाँ है ?
दिल्ली, बड़ा सा नर्सिंग होम है,अच्छा चलता है |
और फेमिली ?
बेटा एम् बी बी एस कर रहा है , बेटी एम् सी ऐ | बस |
सुखी हो |
बहुत , अब तुम बताओ |
एक प्यारी सी हाउस मनेजर पत्नी है, सुभी, सुभद्रा | बेटा बी टेक कर रहा है और बेटी एम् बी ऐ |
और कविता ?
वो कौन थी, तीसरी तो कोई नहीं ?
तुम्हें याद है अभी तक वो पागलपन |
एक संग्रह छापा है , 'तेरे नाम '
मेरे नाम !
" नहीं तेरे नाम '
ओह !, मेरे नाम क्या है उसमें ?
सुबह देखलेना |
चलो सोजाओ ,सुबह बातें होंगीं ,फ्री टाइम में मेरीन ड्राइव घूमना है, बहुत सी बातें करनीं हैं तुम्हारे साथ |
राजधानी एक्सप्रेस तेजी से भागी जारही थी| सामने बर्थ पर , सुमित्रा कम्बल लपेट कर सोने के उपक्रम में थी और मेरी कल्पना यादों के पंख लगाकर बीस वर्ष पहले के काल में काल में गोते लगाने लगी |
** ** **
सुमिता कुलकर्णी , कर्नल कुलकर्णी की बेटी , चिकित्सा विद्यालय में मेरी सहपाठी , बेच पार्टनर, सीट पार्टनर | सौम्य, सुन्दर ,साहसी ,निडर, तेज तर्रार, स्मार्ट, वाक्-पटु, सभी विषयों में पारंगत , खुले व सुलझे विचार वाली , वर्त्तमान में जीने वाली , मेरी परम मित्र | हमारी प्रथम मुलाक़ात कुछ यूं हुई |
रात के लगभग ९ बजे ,लाइब्रेरी से बाहर आया तो सुमित्रा आगे आगे चली जारही थी , अकेली |मैंने तेजी से उसके साथ आकर चलते चलते पूछा, अरे इतनी रात कहाँ से ?रास्ता सुनसान है ,तुम्हें डर नहीं लगेगा,क्या होस्टल छोड़ दूं ?
अजीव हैं , डर की क्या बात है |
ओ के , वाय, गुड नाईट , मैंने कहा | और चलदिया |
थैंक्स गाड, जल्दी पीछा छूटा , वह बड़ बडाई |
सात कदम तो साथ चल ही लिए हैं , मैंने मुस्कुराते हुए कहा |
क्या मतलब , वह झेंप कर देखने लगी , तो मैंने पुनः ' बाई' कहा और चल दिया |
फिजियो लेब में सुमित्रा झिझकते हुए बोली, कृष्ण जी , ये मेंढ़क ज़रा 'पिथ' कर देंगे ?
क्यों , मैंने पूछा ?
ज़िंदा है अभी |
तो क्या मरे को मारोगी , हाँ ये बात और है कि, सुन्दर सुन्दर को क्यों मारे , सुन सुन्दर मेंढक बेचारे | ", बगल की सीट पर बैठा सोम सुन्दरम हंसने लगा | मैंने मेंढक हाथ में लेते हुए कहा, 'ब्यूटीफुल ' |
कौन, क्या ?
ऑफकोर्स , मेंढक , मैंने कहा | सुन्दर है न ?
आपके जैसा है | वह चिढ कर बोली |
मैं तुम्हें सुन्दर लगता हूँ ,|
नहीं , मेढक , वह मुस्कुराकर बोली |
इसकी टांगें कितनी सुन्दर हैं , मैं टालते हुए बोला , चीन में बड़ी लज़ीज़ तरह से खाईं जातीं हैं |
ठीक है ,पैक करके रख दूंगी , घरलेजाना डिनर के लिए |
तुम्हारी टांगें भी सुन्दर हैं, लज़ीज़ होंगी ,क्या उन्हें भी .....|
क्या बकवास है ?
जो दिख रहा है वही कह रहा हूँ |
हूँ , वह पैरों की तरफ सलवार व जूते देखने लगी |
एक्स रे निगाहें हैं , आर पार देख लेतीं हैं , मैंने कहा |
क्या, वह हड बड़ा कर दुपट्टा सीने पर संभालते हुए ,एप्रन के बटन बंद करने लगी | मैं हंसने लगा तो ,सर पकड़ कर स्टूल पर बैठ गयी बोली, चुप करो, मेंढक लाओ, मुझे फेल नहीं होना है |
लो क़र्ज़ रहा,मैंने मेंढक लौटाते हुए कहा | वह चुपचाप अपना प्रक्टिकल करने लगी |
** ** **
डिसेक्सन हाल में मैंने उससे पूछा , सुमित्रा जी, सियाटिक नर्व को कहाँ से निकाला जाय , दिमाग से ही उतर गया है | ' है भी ..' उसने हाथ से चाकू लगभग छीन कर चुपचाप चीरा लगा कर फेसिया तक खोल दिया | बोली आगे बढूँ या....|अभी के लिए बहुत है मैंने कहा --""आपने चिलमन ज़रा सरका दिया | हमने जीने का सहारा पालिया ""
सुमित्रा चुपचाप अपने प्रेक्टिकल में लगी रही | बाहर आ कर बोली --
कृष्ण जी , उधार बराबर |
'और व्याज ' मैंने कहा |
सूद , वह आश्चर्य से देखने लगी |
वणिक पुत्र जो ठहरा |
क्या सूद चाहिए !
चलो , दोस्ती करलें |काफी पीते हैं , मैंने कहा तो वह सीने पर हाथ रख कर बोली , ओह , ठीक है , मेरा तो नाम ही सुमित्रा है , दोस्ती करती है तो करती है , नहीं तो नहीं | केबिन में बैठकर मैंने उसका हाथ छुआ तो कहने लगी, उंगली पकड़ कर हाथ पकड़ना चाहते हैं , इसे तो तुम नहीं लगते| आशाएं विष की पुड़ियाँ होतीं हैं ,बचे रहना |
सुमित्रा जी, मैंने कहा ,'मैं नारी तुम केवल श्रृद्धा हो' के साथ पुरुष सम्मान,व नारी समानता दोनों का समान पक्षधर हूँ | वादा जब तक तुम स्वयं कुछ नहीं कहोगी ,कुछ नहीं चाहूंगा | स्मार्ट, आत्म विश्वास से भरपूर , मर्यादित नारी की छवि का में कायल हूँ |
ब्रेवो ,ब्रेवो ! वाह ! क्या बात है , पर ये भाषण तो मुझे देना चाहिए और ये विचित्र से विचार तो कहीं सुने - पढ़े से लगते हैं , कृष्ण गोपाल !, वही तर्क ,वही उक्तियाँ , नारी -पुरुष समन्वय , शायरी | क्या तुम के. जी. के नाम से 'नई आवाज़' में लिखते हो , तुम के जी हो ! उसकी तीब्र बुद्धि का कायल होकर मैं हतप्रभ रह गया और आँखों में आँखें डाल कर मुस्कुराया |
वाह हंसी, एक उन्मुक्त हंसी | कमीज़ की कालर ऊपर उठाने वाले अंदाज़ में बोली, ये हम हैं , उड़ती चिड़िया के पर गिन लेते हैं | 'आई एम् इम्प्रेस्सेड " मैं तो के जी की फेन हूँ | कोई कविता हो जाय |वाह गालों पर हथेली रखकर श्रोता वाले अंदाज़ में कोहनी मेज पर टिका कर बैठ गयी | मैंने सुनाया--
" मैंने सपनों में देखी थी , इक मधुर सलोनी सी काया |" ...... " तुमको देखा मैंने पाया यह तो तुम ही थीं मधुर प्रिये |" वाह , वह बली , मैं सुखानुभूति से भरी जारही हूँ ,कृष्ण | वह मेरा हाथ पकडे बैठी रही |
तो दोस्ती पक्की , मैंने पूछा | तो कहने लगी, हूँ ,अद्भुत तर्क,ज्ञान वैविध्य ,विना लाग लपेट बातें , मनको छूतीं हैं कृष्ण | और तुम्हें ...|
हाँ ,तुम्हारा आत्म विश्वास , सुलझे विचार,वेबाक बातें ,काव्यानुराग मुझे पसंद हैं सुमित्रा | वह अचानक सतर्क निगाहों से बोली, कहीं पहली नज़र में प्यार का मामला तो नहीं ! शायद , और तुम....मैंने पूछा | तो बोली पता नहीं , नहीं कर सकती, दोस्त ही रहूँगी , मज़बूर हूँ |
क्यों मज़बूर हो भई |
दिल के हाथों , के जी जी | तुम पहले क्यों नहीं मिले , मैं वाग्दत्ता हूँ | रमेश को बहुत प्यार करती हूँ | शादी भी करूंगी |
ये रमेश कौन भाग्यवान है , मैंने पूछा तो बोली, मेरा पहला प्यार , हम एक दूसरे को बहुत चाहते हैं | दिल्ली में एम्,बी बी एस कर रहा है ,बहुत प्यारा इंसान है | और मैं , जब मैंने पूछा तो ख्यालों से बाहर आती हुई बोली , तुम ..तुम हो , अप्रतिम , समझलो राधा के श्याम, और मैं तुम्हारी काव्यानुरागिनी | समझे , वह माथे से माथा टकराते हुए बोली |
अब मैं सुखानुभूति से पागल ह़ा जारहा हूँ ,सुमि |
साथ छोड़कर भागोगे तो नहीं |
नहीं , मैंने कहा, " मैं यादों का मधुमास बनूँ , जो प्रतिपल तेरे साथ रहे ", तो हंसने लगी , क्या देवदास बन जाओगे ? अरे नहीं , मैंने कहा , क्या मैं इतना बेवकूफ लगता हूँ | उसने कहा---" मन से तो मितवा हम हो गए हैं तेरे , क्या ये काफी नहीं है तुम्हारे लिए" --- मेरी कविता कैसी है महा कवि के जी ? मैंने कहा,' आखिर शिष्या किसकी बनी हो |', हम दोनों ही हंस पड़े , फिर अचानक चुप होगये |
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कालेज डे मनाया जाना था| सुमिता तेज तेज चलते आई , बोली , कृष्ण एक गीत बनाना है और तुम्हीं को गाना है | मैं नृत्य में अपना नाम दे रही हूँ | पर मुझे गाना कहाँ आता है , मैंने बताया | किसी अच्छे गायक को लो न | नहीं नहीं , वह बोली ज्यादा लोगों को मुंह क्या लगाना , सब तुम्हारे जैसे सुलझे थोड़े ही होते हैं , वह सर हिलाकर बोली |
रिहर्शल पर मैंने अपना पार्ट सुनाया --"" तुम स्यामल घन , तुम चंचल मन | तुम जीवन हो तुमसे जीवन ||
तेरी प्रीति की रीति पै मितवा , मैं गाऊँ मैं बलि बलि जाऊं ||""
सुमित्रा ने सुनाया ----""तेरे गीतों की सरगम पै , मस्त मगन मैं नाचूं गाऊँ |
तेरी प्रीति की रीति पै मितवा , बनी मोहिनी मैं लहराऊँ ||
सुमि ने कई बार गा गा कर बताया , डांस पहले स्लो रिदम पर फिर मध्यम पर अंत में द्रुत पर करूंगी, अंतरा इस तरह आदि आदि | प्रोग्राम बहुत अच्छा रहा सुमि नाराज़ होते हुए बोली , बड़े खराब हो के जी ,मनही मन मज़ाक बना रहे होगे | तुम तो बहुत अच्छा गा लेते हो , लगता था जैसे पंख लग गए हों आज मैं बहुत बहुत बहुत खुश हूँ | पर "श्यामल घन " मेरा मजाक तो नहीं उड़ा रहे, वह खुल कर हंसने लगी |
नहीं जी, श्याम सखी, द्रौपदी, अप्रतिम सुन्दरी , भी कोई बहुत गौर वर्णा नहीं थी |
मुझे द्रौपदी कह रहे हो | मैंने कहा , नहीं भई ,पर क्या द्रौपदी पर क्या कोई शंका है तुम्हें ? तो हंसने लगी , बोली नहीं के जी जी , तुम्हारी बात तो बैसे ही सटीक बैठती है ,मैं भी खुद को द्रौपदी कहती हूँ | मेरे भी पांच पति हैं | मैंने उसे आश्चर्य से देखा तो बोली -पति क्या है ? जो पत रखे , पतन से बचाए | शास्त्र बचन है --" यो , सख्यते , रक्ष्यते पतनात इति सः पति "
किस शास्त्र का है , मैंने पूछा | मेरे शास्त्र का , वह हंसकर बोली , मैंने भी हंसकर कहा , तब ठीक है , और पांच पति ?
जो पतन से बचाएं , शास्त्र व माता पिता के बचन,मेरी अपनी शिक्षा- दीक्षा ,मेरा चरित्र व आचरण ,रमेश , और .ररर ......तुम | मैं चुप अवाक ... तो बोली, चकरा गए न ज्ञानी ध्यानी , फिर खिलखिलाकर भाग खडी हुई |
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धीरे धीरे जब चर्चाएँ गुनगुनाने लगीं तो एक दिन सुमि बोली, कोई चिंता नहीं के जी | कोई सफाई नहीं , भ्रम में जीने दो सभी को | लगभग सभी बड़ी बड़ी डिग्रियां लेकर अर्थ पुजारी बनने वाले हैं | प्रेम मित्रता, दर्शन ,जीवन-मूल्य , परमार्थ सब व्यर्थ हैं इनके लिए | शायद मैं कुछ मतलवी होरही हूँ , तुम्हें यूज़ कर रही हूँ | तुम्हारे साथ रहते कोई और तो लाइन मारकर बोर नहीं करेगा | मैंने प्रश्न वाचक निगाहों से देखा तो पूछ बैठी ,
'कोई भ्रम या अविश्वास तो नहीं लिए बैठे हो मन ही मन | ', कभी एसा लगा , मैंने पूछा | उसके नहीं कहने पर मैंने कहा , तो सुनो ---" ये चहचहाते परिंदे, ये लहलहाते फूल , अपनी मुख़्तसर ज़िंदगी मैं इतने ग़मगीन नहीं तो होते कि खुद कुशी कर लें "
वाह ! मीना कुमारी पढ़ रहे हो आज कल ! , नहीं अभी तो सुमित्रा कुमारी पढ़ रहा हूँ , मैंने हंसकर कहा तो बोली | तो सुनो सुमि का लालची आत्म निवेदन ---
"" मैं हूँ लालच की मारी ,ये पल प्यार के,
,चुन के सारे के सारे ही संसार के ;

रखलूं आँचल में सारे ही संभाल के|
प्यार का जो खिला है ये इन्द्रधनुष ,
जो है कायनात पै सारी छाया हुआ ;
प्यार के गहरे सागर मैं दो छोर पर
डूब कर मेरे मन है समाया हुआ | ""
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सोचते सोचते जाने कब नींद आगई | सुबह किसी के झिंझोड़ने पर मैं जागा |
क्या है सुभी सोने दो न |
मैं सुमि हूँ ,के जी , उठो | क्या सपना देख रहे हो |
मैं हड बड़ा कर उठा , ओह ! गुड मोर्निंग |
वेरी वेरी गुड है ये मोर्निंग , तुम्हारे साथ, कृष्ण | चलो आज मैं काफी लाई हूँ | सुमि खुले हुए बालों में फ्रेश होकर दोनों हाथों में कप पकडे हुई थी | हम दोनों ही हंस पड़े | मैंने उसे ध्यान से देखा |बीस वर्ष बाद की सुमि | वही तेज तर्रार, आत्म विश्वास से भरी गहरी आँखें,मर्यादित पहनावा,गरिमा पूर्ण सौन्दर्य | कनपटी पर कही कही झांकते , समय की कहानी कहने को आतुर रुपहले बाल |
क्या देख रहे हो , सुमि आँखों में झांकते हुए मुस्कुराई |- मै भी मुस्कुराया---"" दिल ढूढता है फिर वही , वो सुमि वो प्यारे दिन |
बैठे हैं तसब्बुर में , जवाँ यादें लिए हुए |""" , तुम तो वैसे ही हो योगी राज , वह हंसने लगी |
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कार्यक्रमानुसार, हम लोग चौपाटी, मेरीन ड्राइव आदि घूमते रहे | चाट भेल पूरी आदि के वर्किंग लंच के बीच पुरानी यादें ताजा करते रहे | सुमि कहने लगी , सच कृष्ण , जब भी मैं उदास या थकी हुई परेशान होती हूँ तो चुपचाप झूले पर बैठ कर एकांत में कालिज व तुमसे जुडी हुई यादों में खोजाती हूँ , जो मुझमें पुनः नवीनता का संचार करतीं हैं | सच है अच्छी यादे सशक्त टानिक होतीं हैं | क्या में विभक्त व्यक्तित्व हूँ ? और तुम तो अपने बारे मै कभी कहते ही नहीं |
नहीं सुमि, तुम अभक्त, अनंत,परम सुखी व्यक्तित्व हो , मैंने कहा , और मैं भी |
हर बात का उत्तर है तुम्हारे पास और तुरंत| उसने बांह पकड़कर , सर कंधे से लगाते हुए कहा , चलो अब कुछ सुनादो | मैंने सुनाया --
"" प्रियतम प्रिय का मिलना जीवन, साँसों का चलना है जीवन |
मिलना और विछुदाना जीवन , जीवन हार भी जीत भी जीवन ||""
सुमि ने जोड़ दिया ---""प्यार है शाश्वत ,कब मरता है , रोम रोम में बसता है |
अजर अमर है वह अविनाशी ,मन मैं रच बस रहता है "" ये तुमने कहाँ से याद किया , मैंने आश्चर्य से पूछा | मैंने तुम्हारी सब किताबें पढीं हैं , वह बोली | कुछ देर हम चुप दोनों ही चुप रहे , फिर मैंने पूछा- कब जारही हो ?
आज चार बजे की फ्लाईट से,यहाँ का काम जल्दी ख़त्म होगया |, दो बज रहे हैं , मैंने घड़ी देखते हुए कहा , एयर पोर्ट छोड़ने चलूँ |
हाँ |
हम टेक्सी लेकर सुमि के गेस्ट हाउस होकर एयर पोर्ट पहुंचे | लाउंज के एक कोने में खड़े होकर अचानक सुमि बोली, मुझे किस करो कृष्ण |
' क्या कह रही हो, मैंने आश्चर्य से उसे देखा |'
' अब मैं ही कह रही हूँ, यही कहा था न तुमने |' मैंने ओठों से उसके माथे को छुआ तो वह खिलखिला कर हंसती चली गयी | फिर बोली -
मैं क़र्ज़ मुक्त हुई कृष्ण ,चैन से जा सकूंगी, कहीं भी | वह गहराई से आँखों में झांकती हुई बोली|
और सूद , मैंने कहा |
अगले जन्म मैं |
हम अगले जन्म में भी पक्के दोस्त रहेंगे मैंने अनायास ही हंसते हुए कहा |
नहीं , पति -पत्नी |
' व्हाट '
"अगले जन्म की प्रतीक्षा करो के जी " और वह तेजी से बोर्डिंग लाउंज में प्रवेश कर गयी |
--- इति ---

4 comments:

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत अच्छी लगी कहानी। ड़ श्याम गुप्ता जी को बधाई

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद , निर्मला जी । हिन्दी साहित्य मन्च को छापने के लिये भी धन्यवाद ।

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना
बहुत बहुत आभार
इस उम्दा रचना के लिए बधाई

श्याम सखा 'श्याम' ने कहा…

bhavk kahani hai badhyee
shyam.skha