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शनिवार, 5 सितंबर 2009

हिन्दी पखवाड़े में आज का व्यक्तित्व --- महात्मा गंगा दास


हिन्दी पखवाड़े को ध्यान में रखते हुए हिन्दी साहित्य मंच नें 14 सितंबर तक साहित्य से जुड़े हुए लोगों के महान व्यक्तियों के बारे में एक श्रृंखला की शुरूआत की है । जिसमें भारत और विदेश में महान लोगों के जीवन पर एक आलेख प्रस्तुत किया जा रहा है । । आज की तिसरी कड़ी में हम " महात्मा गंगा दास जी" के बारे में जानकारी दे रहें ।आप सभी ने जिस तरह से हमारी प्रशंसा की उससे हमारा उत्साह वर्धन हुआ है उम्मीद है कि आपको हमारा प्रयास पसंद आयेगा


झूलत कदम तरे मदन गोपाल लाल,

बाल हैं बिशाल झुकि झोंकनि झुलावती।१।

कोई सखी गावती बजावती रिझावती,

घुमड़ि घुमड़ि घटा घेरि घेरि आवती।२।

परत फुहार सुकुमार के बदन पर,

बसन सुरंग रंग अंग छबि छावती।।

कहैं गंगादास रितु सावन स्वहावन है,

पावन पुनित लखि रीझि कै मनावती।।

श्री गंगा दास जी।। कवित



हात्मा गंगा दास जी को हममे से बहुत कम ही लोग जानते होंगे। लेकिन महात्मा गंगा दास जी ने हिन्दी साहित्य के विकास मे जो कार्य किए वह उलेख्खनीय है। महात्मा गंगा दास जी को हिन्दी गद्द का भिष्म पितामहः कहा जाता था।
महात्मा गंगा दास जी का जन्म दिल्ली-मुरादाबाद मार्ग पर स्थित बाबूगढ़ छावनी के निकट रसूलपुर ग्राम में सन्‌ १८२३ ई. की बसंत पंचमी को हुआ था। इनके पिता चौधरी सुखीराम एक बड़े जमींदार थे। इनकी माता का नाम दारवा था, जो हरियाणा के बल्लभगढ़ के निकट स्थित दयालपुर की रहने वाली थीं। संत गंगा दास के बचपन का नाम गंगाबख्श था। अल्पायु में ही इनके माता-पिता का देहान्त हो गया था। माता की मृत्यु के पश्चात इन्हें संसार से विरक्ति हो गई। अन्तत: ११ वर्ष की आयु में इन्होंने घर छोड़ दिया था। बाद में ये संत विष्णु दास उदासीन से दीक्षा लेकर गंगाबख्श से गंगा दास बन गए। संत जी का जन्म मुंडेर गोत्र के हिंदू जाट परिवार में हुआ. संत जी के पूर्वज बहुत पहले पंजाब के अमृतसर जिले के मांडला नमक स्थान से आकर मेरठ मंडल में रहने लगे थे. मेरठ मंडल में आकर इनके परिवार की १५ पीढियाँ बीत चुकी हैं. इनकी पारिवारिक स्थिति अत्यन्त संभ्रांत थी. उस समय इस परिवार के पास ६०० एकड़ जमीन थी. बचपन में बालक गंगा दास बहुत साफ़ सुथरे रहते थे और तनिक सी मिटटी लगने पर रोने लगते थे. इस आदत के कारण लोग व्यंग से इनको भगतजी कहते थे. यह कौन जनता था कि यह बालक एक दिन महान महात्मा बनेगा.। संत गंगा दास जी ने काशी में २० वर्षों तक रहकर वेदांत, व्याकरण, गीता, महाभारत, रामायण, रामचरित मानस, अद्वैत कौस्तुम तथा मुक्तावली आदि दार्शनिक ग्रंथों का गहन अध्ययन किया। इस महान संत-कवि ने ९० वर्ष की अवधि में लगभग ५० काव्य-ग्रन्थों और अनेक स्फुट निर्गुण पदों की रचना की। इनमें से ४५ काव्य ग्रन्थ और लगभग ३००० स्फुट पद प्राप्त हो चुके हैं। इनमें से ५ कथा काव्य और शेष मुक्तक हैं। १९१३ ई. में जन्माष्टमी को प्रात: ६ बजे वे व्रह्मलीन हुए। उनकी इच्छानुसार इनके शिष्यों ने उनका पार्थिव शरीर परम-पावनी गंगा में प्रवाहित कर दिया। ज्ञान, भक्ति और काव्य की दृष्टि से संत-कवि गंगा दास का व्यक्तित्व अनूठा सामने आता है। परन्तु इनका काव्य अनुपलब्ध होने के कारण हिन्दी साहित्य में इनका उल्लेख नहीं हो पाया। संत गंगा दास द्वारा रचित काव्य पर कु्छ विद्वानों के मत इस प्रकार है:................... आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी - हिन्दी साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका के अतिरिक्त संत काव्य की सौन्दर्य दृष्टि और कला पर संत गंगा दास का काव्य सुंदर प्रकास डालता है. डॉ रामकुमार वर्मा - ज्ञान भक्ति और काव्य की दृष्टि से संत कवि गंगा दास विशेष प्रतिभावान रहे है परन्तु इनका काव्य अनुपलब्ध होने के कारण हिन्दी साहित्य के इतिहास में इनका उल्लेख नहीं हो सका था.।

2 comments:

अनुनाद सिंह ने कहा…

यह एक दुखद सत्य है कि हिन्दी की उन्नति के लिये जी-जान से काम करने वाले बहुत से लोग गुमनामी के अंधकार में डुबा दियी गये हैं।

हिन्दी-पक्ष के उपलक्ष्य में उनका स्मरण करना एवं उनके बारे में सबको बताना पुनीत कार्य है। इसके लिये आपको साधुवाद।

neeshoo ने कहा…

गंगा दास जी का हिन्दी में जो योगदान है वह सराहनीय है पर हम सभी ऐसे लोगों को भुला रहे हैं । जो कि दुखद बात है ।