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सोमवार, 25 मई 2009

गीत


हम भी अंतर मन के स्वर को लिख पाते
शब्दों की परिधी में भाव समा जाते ॥


तेरी आंहें और दर्द लिखते अपने
लिखते हम फिर आज अनकहे कुछ सपने
मरुस्थली सी प्यास भी लिखते होटों की
लिखते फिर भी बहती गंगा नोटों की
आंतों की ऐंठन से तुम न घबराते
हम भी अंतर मन के स्वर को लिख पाते॥

तेरे योवन को भी हम चंदन लिखते
अपनी रग रग का भी हम क्रंदन लिखते
लिख देते हम कुसुम गुलाबी गालों को
फिर भी लिखते अपने मन के छालों को

निचुड़े चेहरों पर खंजर आड़े आते
हम भी अंतर मन के स्वर को लिख पाते


पीड़ा के सागर में कलम डुबोये हैं
मन के घाव सदा आँखों से धोये हैं
नर्म अंगुलियों का कब तक स्पर्श लिखें
आओ अब इन हाथों का संघर्ष लिखें
लिखते ही मन की बात हाथ क्यों कंप जाते
हम भी अंतर मन के स्वर को लिख पाते

डॉ.योगेन्द्र मणि

3 comments:

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत ही अछ्छा लगा आप का ये गीत, वास्तव मे आप का ये गीत दिल मे उतरने वाला गीत हैं।योगेन्द्र जी आप को इस गीत के लिये बधाई हो।

neeshoo ने कहा…

sundar geet yogendra ji . acche bhav lage . badhai bahut bahut

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

योगेन्द्र जी , बहुत ही सन्दर गीत लगा । अच्छा लिखा है .............कोमल भावाभिक्ति । बधाई