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मंगलवार, 12 मई 2009

मशीनी जीवन [एक कविता] - अवनीश तिवारी की

बैठते - उठते मशीनों संग ,
मशीन बन गया हूँ मैं ,
नैतिक मूल्यों से दूर ,
निर्जीव, सजीव रह गया हूँ मैं |

मस्तिष्क के पुर्जों का जंग ,
विचारों को करता प्रभावहीन ,
और अंगों में पड़ता जड़त्व ,
स्फूर्ती को बनाता गतिहीन |

दिनचर्या का हर काम,
बन चुका पर - संचालित,
और मेरे उद्योग का परिणाम,
लगता है पूर्व - नियोजित |

नूतनता का अभाव ,
व्यक्तित्व को निष्क्रिय बनाए ,
कार्य - प्रणाली के प्रदूषण ,
जर्जता को सक्रीय कर जाए |

जब स्पर्धा के पेंचों का कसाव,
स्वार्थी बना जाता है ,
तब मैत्री के क्षणों का तेल ,
द्वंद - घर्षण दूर भगाता है |

अन्य नए मशीनों में,
अनदेखा हो गया हूँ ,
मशीन से बिगड़ अब ,
कबाड़ हो रहा हूँ |


5 comments:

neeshoo ने कहा…

आपने वर्तमान समय में इंसान की हकीकत को बयां किया है इस रचना के माध्यम से ।

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

वास्तविक चित्रण किया है आपने कविता के माध्यम से अवनीश जी । बधाई

priya ने कहा…

bahut khub

shiv ने कहा…

aaj ka such yahi hai . sunder kavita k liye badhi

shiv ने कहा…

aaj ka such yahi hai . sunder kavita k liye badhi