हमारा प्रयास हिंदी विकास आइये हमारे साथ हिंदी साहित्य मंच पर ..

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

नदी की तरह से

नदी की तरह
बहते रहे तो
सागर से मिलेंगे,
थम कर रहे तो
जलाशय बनेंगे,
हो सकता है कि
आबो-हवा का
लेकर साथ,
खिले किसी दिन
जलाशय में कमल,
हो जायेगा
जलाशय का रूप
सुहावन, विमल,
पर कब तक?
गर्म तपती धूप जैसे
हालातों से
उड़ जायेगी
कमल की
गुलाबी रंगत,
वीरान हो जायेगा
तब फिर
जलाशय,
मगर.....
नदिया बह रही है,
बहती रहेगी,
हरा-भरा
करती रहेगी
और एकाकार हो जायेगी
सागर के संग।

1 comments:

Babli ने कहा…

वाह वाह क्या बात है! बहुत ही उन्दा लिखा है आपने !