सोचता हूँ ,
क्या है अन्तरमन ?
और
क्या है बाह्यमन?
मन तो है-
केवल मन,
चंचल है,
उच्छल है,
एकाग्र है,
गंभीर है।
मेरा मन ,
तेरा मन ......
सोचता हूँ ,
क्या है अन्तरमन ?
और
क्या है बाह्यमन?
मन तो है-
केवल मन,
चंचल है,
उच्छल है,
एकाग्र है,
गंभीर है।
मेरा मन ,
तेरा मन ......
संक्षिप्त परिचय
नाम - डा० (श्रीमती) तारा सिंह
शिक्षा/मानदोपाधि-- साहित्य रत्न , राष्ट्रभाषा विद्यालंकार, विद्या वाचस्पति, विद्या वारिधि, साहित्य महोपाध्याय, कवि कुलाचार्य, भारती रत्न, वर्ल्ड लाइफ़ टाइम अचीवमेन्ट अवार्ड, वोमेन आफ़ दी ईयर अवार्ड,राजीव गांधी अवार्ड
अभिरुचि – कविता, ग़ज़ल, सिनेमा गीत,कहानी,उपन्यास आदि लेखन
संप्रति – संस्थापक अध्यक्ष स्वर्ग विभा (www.swargvibha.tk), कार्यकारी अध्यक्ष, साहित्यिक,सांस्कृतिक,कलासंगम अकादमी,परियावाँ, उपाध्यक्ष,विश्व हिंदी सेवा संस्थान, इलाहाबाद ; साहित्य चर्चा और समाज सेवा
पति - डा० ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह , भूतपूर्व प्राचार्य, रीडर एवं रसायन विभागाध्यक्ष , आचार्य जगदीश चन्द्र बसु महाविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय , कलकत्ता
संपर्क – १५०२,सी क्वीन हेरिटेज़, प्लाट- ६,से० – १८, सानपाड़ा, नवी मुम्बई - ४००७०५
दूरभाष -09322991198, 022- 32996316; 09967362087.
email :- rajivsinghonline@hotmail.com
स्वरचित काव्य -संग्रह प्रकाशित - प्रकाशित -21 ; प्रकाशनाधीन – 4 .
(१) एक बूँद की प्यासी (२) सिसक रही दुनिया (३) हम पानी में भी खोजते रंग (४) एक पालकी चार कहार (५) साँझ भी हुई तो कितनी धुँधली (६) एक दीप जला लेना (७) रजनी में भी खिली रहूँ किस आस पर (८) अब तो ठंढी हो चली जीवन की राख (९) यह जीवन प्रातः समीरण-सा लघु है प्रिये (१०) तम की धार पर डोलती जगती की नौका (११) विषाद नदी से उठ रही ध्वनि (१२) नदिया-स्नेह बूँद सिकता बनती (१३) नगमें हैं मेरे दिल के (गज़ल संग्रह) (१४) यह जग केवल स्वप्न असार (१५) तुम्हारी वो काफ़िर निगाहें (१६) सिमट रही संध्या की लाली (१७) तृषा (कहानी संग्रह) (१८) बर्गे यासमन (गज़ल संग्रह) (१९) साँझ का सूरज (२०) खिरमने गुल (गज़ल संग्रह) (२१) दूसरी औरत (उपन्यास) (२२) जो कह न सकी (शीघ्र प्रकाश्य) (२३) जीवन की रेती पर (शीघ्र प्रकाश्य),(२४) नक्षत्र लोक (शीघ्र प्रकाश्य) (२५) कुछ मेरी कुछ आपकी (शीघ्र प्रकाश्य)
सहयोग़ी काव्य-संकलन प्रकाशित -- 67
(१) पूरब-पश्चिम (२)गजल प्रिया-२००४ (३) फूल खिलते रहेंगे (४) काव्य गंगेश्वरी (५) स्त्री नहीं प्रकृति हो तुम (६) आत्मा की पुकार (७) यादों के फूल (८) नया क्षितिज (९) काव्य मंदाकिनी (१०) कविता की लकीर (११) शब्द कलश (१२) काव्य सरिता (१३) रश्मिरथी (१४) अभिव्यक्ति (१५) स्मृति के सुमन (१६) शून्य से शिखर तक (१७) अन्तर्मन (१८) देश- परदेश (१९) लेखनी के रंग (२०) काव्य मंजूषा (२१) श्रम साधना और साहित्य के दर्पण (२२) काव्य सुधा (२३) शब्द -सूर्य (२४)गंगोत्री- (२५) स्वर पसून (२६)काव्य संगम (२७)सप्त सरोवर (२८)शब्द माधुरी (२९)युवा कौन (३०)सरोरूह (३१)काव्य सलिला (३२)अंजुमन (३३)काव्य मजुषा'०७ (३४)वंदना (३५)यादें (३६) साधना सार्थक होगी (३७) काव्य दर्पण (३८) सद्भावना एवं साहित्य दर्पण (३९) सुरभि पुष्प (४०)शब्द तरंग (४१) शब्द सखा (४२) उजास (४३) कैसे कहूँ (४४) अष्ट कमल (४५) दूर गगन तक (४६) शब्द गंगा (४७) लहराये तिरंगा प्यारा (४८) एक दीप जला लेना (४९) काव्य गंगा (५०) हृदय के गीत (५१) हिमालय की गुड्डी (५२) स्नेहिल स्मृतियाँ (५३) संगमन (५४) आईना (५५) देव सुधा (५६) लाड़ली बेटियाँ (५७) काव्य सिंधु ये मेरा भारत (५८) कण-कण चंदन (५९) माटी के रंग (६०) विदुषी (६१) अभिव्यंजना (६२) माँ तुझे सलाम (६३) आखर के नये घराने (६४) काव्य सागर (६५) काव्य सुधा द्वितीय (६६) नमन करें मातृभूमि को (६७) सत्यमेव जयते (६८) अन्य अनेक पत्र-पत्रिकाओं में
Websites (21) :-
(i) www.poetrypoem.com/tarasingh,(
(x) http://sharepoetry.com/user/
(xiii) www.storypublisher.com/
(xvi) www.kaavyanjali.com, (xvii) www.kavitakosh.org , (xviii) www.writers-club.com,
(xix) www.srijangatha.com (XX) www.sahityakunj.net (xxi) www.swargvibha.net.
Above sites included in search engine data base of alltheweb, yahoo, altavista & google.
सम्मान / पुरस्कार / मानदोपाधि :--
फिल्मी गीत –
'जयहिन्द सिपाई जी ‘ हिन्दी फिल्म के लिए कविता, तीसरी पुस्तक से अनमोल प्रोडक्शन , मुम्बई द्वारा शीर्ष गीत के रूप में ली गई |
सदस्यता -
(५ ) अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन केन्द्रीय संस्था,भोपाल की आजीवन सदस्यता
(६) संरक्षक-परामर्शदाता मण्डल, अ० भा० साहित्यकार अभिनन्दन समिति, मथुरा की
आजीवन सदस्यता
(७) अखिल भारतीय कवयित्री सम्मेलन, खुरजा (उ० प्र०) की आजीवन सदस्यता
जीवन वृत्त प्रकाशित -
एफ्रो - एशियन हूज -हू, खंड १ (२००६) (२) एशिया-पैशेफिक हूज -हू, खंड ६ (२००६) , (३ )राईजिंग पर्सोनालिटी आफ़ इन्दिअ अवार्ड बुक,२००६ (४) बेस्ट सिटिजेन्स आफ़ इन्डिया बुक,२००८, पृष्ठ-६६.
देवों के सिर विजयध्वज फहराऊंगा
पूर्व युग सा इस धरा पर,
मानव अब नहीं रहा लाचार
देख जगह का अभाव,
आसमां का खोलकर द्वार
रहने चला गया क्षितिज के उस पार
सोचा, अपने नये इरादों से मसलकर पृथ्वी को गोल
आकार में बदलकर ,
रचूँगा एक नया इतिहास
विजय- ध्वज फ़हराऊँगा देवों के सिर पर,जिससे
चतुर्दिक फ़ैली रहेगी सुनहली शांति,
बनकर हिम फ़ुहार
हमारी नसों में बह रहा है कलयुग का लहू
अब हम नहीं रहेंगे बनकर प्रकृति का दास
मृतकों के इस अभिशप्त महीतल से ऊपर उठकर
स्वच्छंद होकर विचरूँगा आकाश, जहाँ हमारे
स्वागत में भयभीत होकर चाँद – तारे दोनों
भुज फ़ैलाये खड़े हैं, सूरज कर रहा है इंतजार
सतयुग, त्रेता, द्वापर बहुत पीछे छूट गये
बहुत दूर निकल आया है मृगमय संसार
वसुधा पर अब इतना कोलाहल भर गया, कि
मुश्किल हो गया है, कल्पना का लेना नया आकार
हत्या, लूट-पाट जैसे संक्रामक रोगों का हो गया प्रसार
एकाकी दुखी असहाय मनुज के मन में रहने लगा तनाव
मानव-मन बुद्धि आकाश का इतना किया विकास
कि भ्रांत नर अपने आविष्कृत दानव की भूख
मिटाने, अपने तन को बना दिया आहार
बारी-बारी से मुट्ठी में बंद किया धरती, आकाश
जब चाहता, वारि से वाष्प बनाता, वाष्प से वारि
बनाकर धरती पर करवाता बरसात
मूक ठगी रह जाती प्रकृति,
अचंभित रहता आकाश
मनुज देह के मांसल रज से,
धरती का निर्माण देखकर
जीवन से मुँह मोड़ती जा रही है नई पीढ़ी
फ़ूलों सा मृदु अंग को त्यागकर, हृदय की मधुरिमा को
पाषाण शिला-सा बनाये जा रहा है,मनुज का यह प्रतिनिधि
इन्हें स्वीकार नहीं अब इस धरती की हरी- भरी हरियाली
निश्चय ही यह नाश का खेल करने वाला है बड़ी अनहोनी
प्रकृति के हर तत्व को मनुज,समझने लगा है अपना गुलाम
नव- धरा के बीच कुछ भी अग्येय न रह पाये
प्रकृति के किस मिट्टी से फ़ूटता, विभव का सहज स्रोत
जिससे इच्छाओं की सभी घाटियाँ पट जाती हैं, इसे ग्यात
करने में जुट गये, करने लगे नये - नये अनुसंधान
पर यह द्रुत उद्दाम एक पल भी विश्राम नहीं दे सकता
न ही ऐसे दिशाहीन उद्देश्य को, कोई कर सकता प्रणाम
चाँद-तारों को उकसाकर, नभ-गिरि को चीरकर
भस्मासुर - सा अणुबल का वरदान प्राप्त कर
आखिर मनिष्य कैसा रचना चाहता इतिहास
क्या वह यह सोचता है, उसके भस्मशेष से
पुन: नवजीवन लेकर जी उठेगा, फ़िर से करेगा-
जीवन निर्माण, तो व्यर्थ है उसकी ऐसी भावना
निराधार है उसका उमंग, झूठा है अभियान
कर - संकुल लोकजीवन का चैन छीनकर
सिंधु, धरा, आकाश को भयभीत कर
इस निराधार बदलाव का क्या है उद्देश्य
जिसमें श्मशान बना जा रहा है धरती का प्रांगण
जीवन कांपता एकांत में भी, मृत्यु रहती अजेय
क्षितिज छोड़ कणक-घन भाग जाता तम में छुपने
प्राणी विलाप करता, खोजता जीने का ध्येय
कूड़े - कचरे, गढ़े- नाले जहाँ भी देखो वहीं
सोये रहते मुर्दे, बिखरे रहते कंकालों के ढेर
टकरा-टकराकर,चटक-चटककर चिनगारी निकलती
निश्चय ही है यह पाषाण नर हृदय की देन