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शुक्रवार, 27 मार्च 2009

हाय समाज...........हाय समाज............!![भूतनाथ जी ]

............न पुरूष और न ही स्त्री..............दरअसल ये तो समाज ही नहीं.........पशुओं के संसार में मजबूत के द्वारा कमजोर को खाए जाने की बात तो समझ आती है......मगर आदमी के विवेकशील होने की बात अगर सच है तो तो आदमी के संसार में ये बात हरगिज ना होती.......और अगरचे होती है.....तो इसे समाज की उपमा से विभूषित करना बिल्कुल नाजायज है....!! पहले तो ये जान लिया जाए कि समाज की परिकल्पना क्या है.....इसे आख़िर क्यूँ गडा गया.....इसके मायने क्या हैं....और इक समाज में आदमी होने के मायने भी क्या हैं....!!
..............समाज किसी आभाषित वस्तु का नाम नहीं है....अपितु आदमी की जरूरतों के अनुसार उसकी सहूलियतों के लिए बनाई गई एक उम्दा सी सरंचना है....जिसमें हर आदमी को हर दूसरे आदमी के साथ सहयोग करना था....एक दूसरे की जरूरतों को पूरा करना था.....एक आदमी ये काम करता.....और दूसरा वो काम करता....तीसरा कुछ और....हर आदमी अपने-अपने हुनर और कौशल के अनुसार समाज में अपने कार्यों का योगदान करता....और इस तरह सबकी जरूरतें पूरी होती रहतीं.....साथ ही हारी-बीमारी में भी लोग एक-दूसरे के काम आते....मगर हुआ क्या............??हर आदमी ने अपने हुनर और कौशल का इस्तेमाल को अपनी मोनोपोली के रूप में परिणत कर लिया...........और उस मोनोपोली को अपने लालच की पूर्ति के एकमात्र कार्यक्रम में झोंक दिया.......लालच की इन्तेहाँ तो यह हुई कि सभी तरह के व्यापार में ,यहाँ तक कि चिकित्सा आदि के क्षेत्रों में भी लालच की ऐसी पराकाष्ठा का यही घृणित रूप तारी हो गया.....और आज यह राजनीति और सेवा कार्यों में तक में भी यही खेल मौजूं हो गया है....तो फ़िर समाज नाम की चीज़ अगर हममे बची है तो मैं जानना चाहता हूँ कि वो है तो आख़िर कहाँ है....एक समाज के सामाजिक लोगों के रूप में हमारे कार्य आख़िर क्या हैं.....कि हम जहाँ तक हो सके एक-दूसरे को लूट सकें...........????
....................क्या यह सच नहीं कि हम सब एक दूसरे को सहयोग देने की अपेक्षा,उसका कई गुणा उसे लूटते हैं.....वरना ये पेटेंट आदि की अवधारणा क्या है......??और ये किसके हित के लिए है.....लाभ कमाने के अतिरिक्त इसकी उपादेयता क्या है.....??क्या एक सभ्य समाज के विवेकशील मनुष्य के लिए ये शोभा देने वाली बात है कि वो अपनी समझदारी या फ़िर अपने किसी भी किस्म के गुण का उपयोग अपनी जरूरतों की सम्यक पूर्ति हेतु करे ना कि अपनी अंधी भूख की पूर्ति हेतु......??मनुष्य ने मनुष्य को आख़िर देना क्या है.....??क्या मनुष्यता का मतलब सिर्फ़ इतना है कि कभी-कभार आप मनुष्यता के लिए रूदन कर लो.....या कभी किसी पहचान वाले की जरुरत में काम आ जाओ....??..........या कि अपने पाप-कर्म के पश्ताताप में थोड़ा-सा दान-धर्म कर लो.......??
.......................मनुष्यता आख़िर क्या है...........??............अगर सब के सब अपनी-अपनी औकात या ताकत के अनुपात में एक दूसरे को चाहे किसी भी रूप में लूटने में ही मग्न हों....??..........और मनुष्य के द्वारा बनाए गए इस समाज की भी उपादेयता आख़िर क्या है..........??.........और अपने-अपने स्वार्थ में निमग्न स्वार्थियों के इस समूह को आख़िर समाज कहा ही क्यूँ जाना चाहिए..........??.........हम अरबों लोग आख़िर दिन और रात क्या करते हैं........??उन कार्यों का अन्तिम परिणाम क्या है......??अगर ये सच है कि परिणामों से कार्य लक्षित होते हैं.............तो फ़िर मेरा पुनः यही सवाल है कि इस समूह को आखर समाज कैसे और क्यूँ कहा जा सकता है......और कहा भी क्यूँ जाना चाहिए.......??
जहाँ कदम-दर-कदम एक कमज़ोर को निराश-हताश-अपमानित-प्रताडित-और शोषित होना पड़ता है......जहाँ स्त्रियाँ-बच्चे-बूढे और गरीब लोग अपना स्वाभाविक जीवन नहीं जी सकते........??जहाँ हर ताकतवर आदमी एक दानव की तरह व्यवहार करता है........!!??
.........दोस्तों मैं कहना चाहता हूँ कि पहले हम ख़ुद को देख लें कि आख़िर हम कितने पानी हैं.....और हमें इससे उबरने की आवश्यकता है या इसमें और डूबने की........??हम ख़ुद से क्या चाहते हैं.........ये अगर हम सचमुच इमानदारी से सोच सकें तो सचमुच में एक इमानदार समाज बना सकते हैं............!!याद रखिये समाज बनाने के लिए सबसे पहले ख़ुद अपने-आप की आवश्यकता ही पड़ती है........तत्पश्चात ही किसी और की.....!!आशा करता हूँ कि इसे हम पानी अपने सर के ऊपर से गुजर जाने के पूर्व ही समझ पायेंगे..........!!!!


गुरुवार, 26 मार्च 2009

‘‘आर्य समाज: नागार्जुन की दृष्टि में’’ डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’



राजकीय महाविद्यालय, खटीमा में हिन्दी के विभागाध्यक्ष वाचस्पति जी थे । बाबा नागार्जुन अक्सर उनके यहाँ प्रवास कर लिया करते थे ।
इस बार भी जून के अन्तिम सप्ताह में बाबा का प्रवास खटीमा में हुआ । दो जुलाई, 1989, महर्षि दयानन्द विद्या मन्दिर टनकपुर में बाबा नागार्जुन के सम्मान में कवि गोष्ठी का आयोजन था । उसमें बाबा ने कहा शास्त्री जी 5,6,7 जुलाई को मैं खटीमा मे आपके घर रहूँगा ।
प्रातःकाल 5 जुलाई को प्रातःकाल शर्मा जी का बड़ा पुत्र अनिमेष बाबा को मेरे निवास पर पहुँच गया । 6 जुलाई को सुबह बाबा का मनपसन्द नमकीन दलिया नाश्ते में बनाया गया । बाबा जी बड़ ही अच्छे मूड में थे । दलिया भी कुछ गरम था ।
उसी समय बाबा ने अपने जीवन के बाल्यकाल का संस्मरण सुनाया - ‘‘शास्त्री जी उस समय मेरी आयु 12 या 14 वर्ष की रही होगी । उस समय में संस्कृत विद्यालय बनारस में पढ़ता था । मन में विचार आया कि इलाहाबाद में पं0 गंगाप्रसाद उपाध्याय आर्य समाज के बहुत बड़े कार्यकर्ता हैं, उनसे मिला जाये । उस समय आर्य समाज की बड़ी धूम भी थी । मैंने अपने दो सहपाठी साथ में चलने के तैयार कर लिए तो पदल ही बनारस से इलाहाबाद को चल पड़े । चलते-चलते प्यास लगने लगी । आगे एक गाँव रास्ते में पड़ा तो कुएँ पर गये । पनिहारिनों ने पानी पिलाने से मना कर दिया और कहा भाई तुम पण्डितों के लड़का मालूम होते हो । हम तो नीच जाति की है, हम तुम्हारा धर्म नही बिगाड़ेंगी । प्यास बहुत जोर की लगी थी । हमने बहुत अनुनय-विनय की तो उन्होंने पानी पिलाया । हम तीनों ने ओक से पानी पिया । उसी रास्ते पर एक ऊँट वाला भी जा रहा था । वह आगे-आगे सबसे कहता चला जा रहा था कि भाई पीछे जो तीन ब्राह्मण लड़के आ रहे हैं , इन्होंने दलितों के कुएँ पर पानी पिया है । इनका धर्म भ्रष्ट हो गया है । अतः लोग हमें बड़ी उपेक्षा की दृष्टि से देखते । अन्ततः हमने रास्ता छोड़ खेतो की मेढ़-मेढ़ चलना शुरू कर दिया । साथ के देानो सहपाठी तो कष्टों को देख कर घबरा कर साथ छोड़ कर वापिस चले गये...वगैरा-वगैरा । किसी तरह इलाहाबाद पहुँचा तो पं0 ग्रंगाप्रसाद उपाध्याय का घर पूछा- लोगों ने बताया कि चैक में पंडित जी रहते हैं । खैर पण्डित जी के घर पँहुचा, उनकी श्रीमती जी से कहा बनारस से आया हूँ, पैदल, पण्डित जी से मिलना है । उन्होंने प्यार से भीतर बुलाया, तख्त पर बैठाया और गर्म-गर्म दूध एक कटोरे में ले आयीं । जब मैंने दूध पी लिया तो उन्होंने कहा कि तुम विश्राम करो । पं0 जी शाम को 7 बजे तक आयेंगे । शाम को जब पण्डित जी आये तो बातचीत हुई । उन्होंने कहा कि तुम बहुत थके हो कल सभी बातें विस्तार में होगी और अपनी पत्नी कलावती को आवाज लगाई, कहा कि देखो ये अपने सत्यव्रत जी के ही समान हैं , इनको 3-4 दिन तक खूब खिलाओ-पिलाओ.....वगैरा-वगैरा ।
3-4 दिन तक पण्डित जी के यहाँ रहा खूब प्रेम से बाते हुईं । जब विदा हुए तो पण्डित जी, उनकी पत्नी और पुत्र सत्यव्रत रेलगाड़ी पर पहुँचाने आये , टिकट दिलाया । अन्त में उनकी पत्नी ने (उस समय में ) दो रुपये जेब खर्च के लिए दिये ।
पण्डित जी बोले कि देखो कभी पैदल मत आना । जब भी इच्छा हो टिकट कटा कर रेलगाड़ी से आया करो । उसके पश्चात 2-3 बार पण्डित जी के यहाँ गया व एक - एक सप्ताह ठहरा । अन्त में बाबा नागार्जुन ने बताया कि ‘आर्य समाज बहुत ही अच्छी संस्था है’ परन्तु आजकल पण्डित गंगाप्रसाद उपाध्याय सरीखे लोगों की कमी हो गयी है ।’’ साथ ही बताया कि ’’आर्य समाज ऊँचा उठने की प्रथम सीढ़ी है ।’’

डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’ पूर्वसदस्य-अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग,उत्तराखण्ड-सरकार, देहरादून। कैम्प-खटीमा, जिला-ऊधमसिंहनगर फोन नं0-05943-250207, मो०-09456383898, 09368499921