हमारा प्रयास हिंदी विकास आइये हमारे साथ हिंदी साहित्य मंच पर ..

सोमवार, 17 अगस्त 2009

"जिन्दगी कोई छोटी चुनौती नहीं" - हिमांशु कुमार पाण्डेय

प्रश्न का चिह्न बन जागती जो खड़ी
जिन्दगी कोई छोटी चुनौती नहीं
हार से डर समरभूमि मत छोड़ना
है सफलता किसी की बपौती नहीं ।



माथ धुनते बिलखते ऋणी रिक्तकर
एक हारे जुआरी-सा जाओगे क्या ?
थपथपा प्यार से पीठ मुख चूमकर
जिसने भेजा उसे मुख दिखाओगे क्या?
जग में जी लेना कीड़े मकोड़े सा तुम
माँ ने मानी थी ऐसी मनौती नहीं ।



श्वान के पूँछ सी यह भी क्या जिन्दगी
कर सकी जो सरलता को धारण नहीं
गुह्य गोपन में सक्षम नहीं, कर सकी
जो मशकदंश का भी निवारण नहीं,
ईश पद धो स्वयं भी निखर जाय क्यों
करता मन केंवटा की कठौती नहीं ।



दिन गये सो गये तूँ है जब से जगा
बस उसी क्षण से अपनी सुबह मान ले
कोख माता की लज्जित करेगा नहीं
बावरे आज ही ऐसा प्रण ठान ले ,
आखिरी साँस तक धैर्य मत छोड़ना
कवि की आती कभी भी बुढ़ौती नहीं ।

शनिवार, 15 अगस्त 2009

"जरा याद इन्हे भी कर लें" - मिथिलेश दुबे

आजादी की सालगिरह में आजादी के परवानों को तो याद किया ही जा रहा है, लेकिन उन गुमनाम हीरोज़ को भी याद करने की जरूरत है, जिन्होंने अपने तरीके से आजादी की मशाल जलाई।
हम आजादी के अवसर पर बङे लोगो को याद तो करते हैं, लेकिन इनके बिच कुछ नाम ऐसे भी है जिनको बहुत कम ही लोग जानते है। वहीं देखा जाये तो हमारे आजादी मे इनका योगदान कम नही है। इनका नाम आज भी गुमनाम है, लेकीन इन्होने जो किया वह काबिले तारीफ है। ये वे लोग जिन्होने आजादी के लिए बिगूल फुकंने का काम किया और ये लोग अपने काम मे सफल भी हुये। तो आईये इस आजादी के शुभ अवसर पे इनको याद करें और श्रद्धाजंली अर्पित करें।

ऊधम सिंह- ऊधम सिंह ने मार्च 1940 में मिशेल ओ डायर को मारकर जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लिया। इस बाग में 4,000 मासूम, अंग्रेजों की क्रूरता का शिकार हुए थे। ऊधम सिंह इससे इतने विचलित हुए कि उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और एक देश से दूसरे देश भटकते रहे। अंत में वह लंदन में इस क्रूरता के लिए जिम्मेदार गवर्नर डायर तक पहुंच गए और जलियांवाला हत्याकांड का बदला लिया। ऊधम सिंह को राम मोहम्मद सिंह आजाद के नाम से भी पुकारते थे। जो हिंदू, मुस्लिम और सिख एकता का प्रतीक है।

जतिन दास - जतिन को 16 जून 1929 को लाहौर जेल लाया गया। जेल में स्वतंत्रता सेनानियों के साथ बहुत बुरा सुलूक किया जाता था। जतिन ने कैदियों के साथ मानवीय व्यवहार करने की मांग पर भूख हड़ताल शुरू कर दी। जेल के कर्मचारियों ने पहले तो इसे अनदेखा किया, लेकिन जब भूख हड़ताल के 10 दिन हो गए तो जेल प्रशासन ने बल प्रयोग करना शुरू किया। उन्होंने जतिन की नाक में पाइप लगाकर उन्हें फीड करने की कोशिश की। लेकिन जतिन ने उलटी कर सब बाहर निकाल दिया और अपने मिशन से पीछे नहीं हटे। जेल प्रशासन ने जबरदस्ती दवाई देने की कोशिश की। लेकिन जतिन ने अपनी तपस्या जारी रखी। जतिन की हालत बिगड़ती गई और 13 सितंबर 1929 को अंग्रेजों के काले कानून से लड़ते हुए जतिन शहीद हो गए।


भीकाजी कामा- इन्होंने जर्मनी में रहकर आजादी की अलख जगाई। वहां भीकाजी ने इंटरनैशनल सोशलिस्ट कॉन्फ़रन्स में 22 अगस्त 1907 को भारतीय आजादी का झंडा फहराया। कॉन्फ़रन्स के दौरान झंडा फहराते हुए उन्होंने कहा कि यह झंडा भारत की आजादी का है।

हिंदुस्तानी लाल सेना- एक ग्रुप नागपुर के जंगलों में गुरिल्ला वॉर के लिए खुद को तैयार कर रहा था। ब्रिटिश शासन के खिलाफ गुरिल्ला वॉर छेड़ने वाला यह शायद उस वक्त इकलौता ग्रुप था