कमरे मे माँ की अलमारी नही
अलमारीनुमा पूरा कमरा है
जिसमे मेरे लिए सूट है
सामी के लिए खिलौना है
इनके लिए परफ्यूम है
मणि के लिए चाकलेट है
एक जोडी चप्पल है
सेल मे खरीदा आचार,मुरब्बा और मसाला है
बर्तनो का सैट है
शगुन के लिफाफा है
जो जो जब जब याद आता है
वो इसमे भरती जाती हैं
ताकि मेरे आने पर
कुछ देना भूल ना जाए
सच, ये अलमारी नही
अलमारीनुमा पूरा कमरा है
Bhavbheeni prastuti....
जवाब देंहटाएंमाँ हर चीज़ ऐसे ही समेटती हैं ...
जवाब देंहटाएंmaan esi hi hoti hai
जवाब देंहटाएंsunder kvita
--- sahityasurbhi.blogspot.com
सुन्दर रचना!
जवाब देंहटाएं"उस कमरे से भी बडी दुनियाँ रखती है वो,
अपने आँचल में एक जहाँ रखती है वो!"
bahut hi khubsurat kavita........pasand aayi
जवाब देंहटाएंकमरा क्या एक पूरी ज़िन्दगी है एक सदी है। अच्छी कविता। मोनिका जी को बधाई।
जवाब देंहटाएंबड़ी आत्मीय सी सुकून भरी रचना ! माँ ऐसी ही होती है ! कुछ भूल ना जाये इसलिए हर छोटी से छोटी चीज़ को वह सहेजती सम्हालती रहती है और खुद कब बिखर जाती है किसीको पता ही नहीं चल पाता ! बहुत ही सुन्दर रचना ! बधाई !
जवाब देंहटाएंआप सभी का कविता पसंद करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद और हिंदी साहित्य मंच खासतौर पर आपका धन्यवाद आपने कविता को प्रकाशित किया
जवाब देंहटाएंमोनिका गुप्ता