( अगीत में )
हे धर्मराज!
मैं बन्धन थी ,
समाज व संस्कार के लिए ,
दिनभर खटती थी ,
गृह कार्य में,
पति परिवार पुरुष की सेवा में
आज , मैं मुक्त हूँ,
बड़ी कंपनी की सेवा में नियुक्त हूँ,
स्वेच्छा से दिनरात खटती हूँ;
अन्य पुरुषों के मातहत रहकरकंपनी की सेवा में
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