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मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

ता उम्र मैं पीता रहूँ यारव वो मय तेरे हुश्न की--------(डा श्याम गुप्त)

ऐ हसीं ता ज़िंदगी ओठों पै तेरा नाम हो |
पहलू में कायनात हो उसपे लिखा तेरा नाम हो |


ता उम्र मैं पीता रहूँ यारव वो मय तेरे हुश्न की,
हो हसीं रुखसत का दिन बाहों में तू हो जाम हो |


जाम तेरे वस्ल का और नूर उसके शबाब का,
उम्र भर छलका रहे यूंही ज़िंदगी की शाम हो |


नगमे तुम्हारे प्यार के और सिज़दा रब के नाम का,
पढ़ता रहूँ झुकता रहूँ यही ज़िंदगी का मुकाम हो |


चर्चे तेरे ज़लवों के हों और ज़लवा रब के नाम का,
सदके भी हों सज़दे भी हों यूही ज़िंदगी ये तमाम हो |


या रब तेरी दुनिया में क्या एसा भी कोई तौर है,
पीता रहूँ , ज़न्नत मिले जब रुखसते मुकाम हो |


है इब्तिदा , रुखसत के दिन ओठों पै तेरा नाम हो,
हाथ में कागज़-कलम स्याही से लिखा 'श्याम' हो ||

4 टिप्‍पणियां:

  1. है इब्तिदा , रुखसत के दिन ओठों पै तेरा नाम हो,
    हाथ में कागज़-कलम स्याही से लिखा 'श्याम' हो ||
    वाह क्या खूब कहा। बहुत अच्छी लगी पूरी गज़ल डा़ गुपता जी को बधाई

    जवाब देंहटाएं
  2. है इब्तिदा , रुखसत के दिन ओठों पै तेरा नाम हो,
    हाथ में कागज़-कलम स्याही से लिखा 'श्याम' हो ||

    is sher mein to poori gazal simat aayi hai.......bahut hi sundar........badhayi

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया गजल है।बधाई।

    जाम तेरे वस्ल का और नूर उसके शबाब का,
    उम्र भर छलका रहे यूंही ज़िंदगी की शाम हो |

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