अधिक पैदावार के लिए कीटनाशक दवाओं के अंधाधुंध प्रयोग के कारण हमारे शरीर में एक अनोखी विष "काकटेल" इकट्ठी होती जा रही है। सामान्यतः कीटनाशक दवाओं का छिड़काव उचित रीति से नहीं किया जाता, परिणामस्वरुप अस्सी से नब्बे पतिशत कीटनाशक कीटों को मारने की बजाय फसंलो पर चिपक जाते है या फिर आस-पास की मिट्टी पर इक्टठे हो जाते है। जिस पर से इनकों हटाने का कोई प्रयास नहीं किया जाता हैं। मांसपेशियों एवं चरबी में जहर इकत्रित होता रहता है या फिर खून में मिलकर धीमें-धीमें जहर के रुप में कार्य करता है और अनेकं बीमारियों को जन्म देता है।
कीटनाशक दवाँ कैसंर और ट्यूमर को बढ़ावा देती है, जबकि कुछ सीधे दिमाग और इससे जुड़ी तंत्रिकाओंपर प्रहार करती है। दौरे पड़ना, दिमाग चकराना और याददाश्त की कमंजोरी जैसे लक्षण कीटनाशक दवाओं के कारण हो सकते हे। कुछ किटनाशक दवाईयाँ शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को भी समाप्त कर देती है। कुछ हारमोन बनाने वाले ग्रंथियों पर चोट करके शरीर की सारी गतिविधियों में उलट-फेर कर देती है।
कीटनाशको के इतने खतरनाक परिणामो के बाद भी इसका उपयोग बिना किसी अवरोध के व्यापक मात्रा में किया जा रहा है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद् द्वारा करवाए गये एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार गाय-भैंस के दूध के लगभग वाईस सौ नमूनो में से 82% मे तथा शिशुओ के डिब्बाबंद आहार के बीस व्यावसायिक ब्राड़ों के १८० नमूनें मेम 70% में डी.डी.टी. अवशेष रुप में मौजूद था। बोतलबंद पानी में किटनाशको की मात्रा स्वीकार्य सीमा से 15% अधिक थी। रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ गेहूँ और चावल के द्वारा हम प्रतिदिन कोई आधा मिली ग्राम (.5mg) डी.डी.टी. और बी.एच.सी खा जाते है। सबसे ज्यादा कीटनाशक हम सब्जियों के द्वारा अपने शरीर में पहुचाते हैं। बैगन को चमकदार बनाने के लिए कार्बोफ्यूरान में डुबाया जाता है। गोभी को चमकदार सफेदी देने के लिए मेथिलपैराथियान डाला जाता है। इसी तरह भिंडी तथा परवल को चमकीला हरा बनाने के लिए कापर सल्फेट और मैलाथियान का इस्तेमाल किया जाता है, जो की हमारे शरीर के लिए जहर का काम करती है। कीटनाशको के बाद हमारे शरीर को सबसे ज्यादा नुकसान आर्सेनिक, कैडियम, सीसा, ताँबा, जिंक और पारा जैसी धातुओं से है। फलों, सब्जियों, मसालों आदि से लेकर शिशु आहार तक ये पर्याप्त मात्रा में पाये जाते है।
दिल्ली विश्वविद्दालय और वाराणसी हिंदू विश्वविद्दालया द्वारा किए गये सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार सब्जियों में सीसे की मात्रा स्वीकार्य सीमा मात्रा से 73% ज्यादा पाई गयी । रिपोर्ट के अनुसार, सब्जियों को बहुत अच्छी तरह पर भी इनके जहरीलेपन को सिर्फ 55% तक ही कम किया जा सकता है। सीसा की अधिकता गुरदा खराब करनेण के अलावा उच्च रक्तचाप भी पैदा करती है। इसका सबसे खतरनाक असर बच्चो के मस्तिष्क पर पड़ता है। सिसायुक्त आहार का सेवन करनेसे बच्चो की बुद्धि का विकास अवरुद्ध हो जाता है, । साथ ही उनकीं बुद्धि मंद पड़ने लगती है। बच्चो की मनपसंद चाकलेट भी खतरे से खाली नहीं है। इसमें मौजूद निकिल त्वचा का कैंसर पैदा करता है। यदि डिब्बा प्लासटिक का है तो यह खतरा और बढ़ जाता है , क्योकिं प्लास्टिक धीरे-धीरे जहरीले रसायन छोड़ता है। प्लास्टिक में मौजूद थेलेन वर्ग के रसायन शरीर के हारमोन संतुलन को तहस नहस कर देते है।
मांसाहार तो शाकाहार से और भी खतरनाक स्थिति में पहुँच चुका है। मांस पर ब्लीचिंग पाउडर लपेट दिया जाता है, ताकि पानि सूखने से मांस का वजन कम न हो जाए। इसी तरह से खून के बहाव पर रोक लगाने के लिए कापर सल्फेट का इस्तेमाल किया जाता है। मछलियों में चमकदार ताजगी लंबे समय तक बनाये रखने के लिए अमोनियम सल्फेट में डुबाया जाता है। इस प्रकार मांसाहार यो तो खतरनाक है ही। अब वह विषयुक्त हो गया है। साथ ही खाद्दपदार्थो मे मिलाये गये कृत्रिम रंग भी शरीर के लिए खतरनाक होते है, तथा बहुत से रोगो का कारण भी बनते है। हमारे शरीर में घुलते-मिलते इस जहर से बचाव का एक ही उपाय है कि हम अपनी प्राचिन पद्धति को पुनः अपनाएँ। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हम अनियमित अनुचित खान पान से बचकर ही अपने स्वास्थ्य की रक्षा कर सकते हैं।
बहुत ही अच्छी और ज़रूरी जानकारी दी है आपने..
जवाब देंहटाएंपर बेचारे किसानों के पास और उपाय भी क्या है? लगानों से दबे रहते हैं ज़िन्दगी भर और उसे ही चुकाने के चक्कर में बाकियों की ज़िन्दगी भी अनजाने में चूक रही है..
इसपर गहन चिंता व उपायों की आवश्यकता है अन्यथा ऐसी बीमारियों पर कोई रोक नहीं रहेगा..
आभार
प्रतीक माहेश्वरी
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इंसान क्या खाए, क्या पकाए?
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क्या स्टारवार शुरू होने वाली है?
परी कथा जैसा रोमांचक इंटरनेट का सफर।
अब सावधान होने का समय है
जवाब देंहटाएंबहुत ही अच्छी जानकारी दुबे जी ।
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