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मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009
लोग--------- (संतोष कुमार "प्यासा")
लोग अपनी ही गलतियों पर आज रो रहे हैं
लोग हर तरफ फैली है झूठ और फरेब की
आग फिर भी अंजान बने सो रहे है
लोग दौलत की आरजू में यूं मशगूल हैं
सब झूठी शान के लिए खुद को खो रहे हैं लोग
जाति, धर्म और मजहब के नाम पर
लहू का दाग लहू से धो रहे हैं
लोग ऋषि मुनियों के इस पाक जमीं
पर क्या थे और क्या हो रहे है लोग
सोमवार, 26 अक्टूबर 2009
गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ का अद्भुत ‘प्रताप’ (जन्मतिथि 26 अक्टूबर पर)
गणेश शंकर ‘विद्यार्थी‘ का जन्म 26 अक्टूबर 1890 को अपने ननिहाल अतरसुइया, इलाहाबाद में हुआ था। उनके नाना सूरज प्रसाद श्रीवास्तव सहायक जेलर थे, अतः अनुशासन उन्हें विरासत में मिला। गणेश शंकर के नामकरण के पीछे भी एक रोचक वाकया है- उनकी नानी ने सपने में अपनी पुत्री गोमती देवी के हाथ गणेश जी की प्रतिमा दी थी, तभी से उन्होंने यह माना था कि यदि गोमती देवी का कोई पुत्र होगा तो उसका नामकरण गणेश शंकर किया जायेगा। मूलतः फतेहपुर जनपद के हथगाँव क्षेत्र के निवासी गणेश शंकर के पिता मुंशी जयनारायण श्रीवास्तव ग्वालियर राज्य में मुंगावली नामक स्थान पर अध्यापक थे। गणेश शंकर आरम्भ से ही किताबें पढ़ने के काफी शौकीन थे, इसी कारण मित्रगण उन्हें ‘विद्यार्थी‘ कहते थे। बाद में उन्होंने यह उपनाम अपने नाम के साथ लिखना आरम्भ कर दिया। विद्यार्थी जी की प्रारम्भिक शिक्षा पिता जी के स्कूल मुंगावली, जहाँ वे एंग्लो-वर्नाकुलर मिडिल स्कूल में अध्यापक थे, में हुई। विद्यार्थी जी उर्दू, फारसी एवं अंग्रेजी के अच्छे जानकार थे। 1904 में उन्होंने भलेसा से अंग्रेजी मिडिल की परीक्षा पास किया, जिसमें पहली बार हिंदी द्वितीय भाषा के रूप में मिली थी। तत्पश्चात पिताजी ने विद्यार्थी जी को पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी करने के लिए बड़े भाई शिवव्रत नारायण के पास कानपुर भेज दिया। कानपुर में आकर विद्यार्थी जी ने क्राइस्ट चर्च कालेज की प्रवेश परीक्षा दी पर भाई का तबादला मुंगावली हो जाने से आगे की पढ़ाई फिर वहीं हुई। वर्ष 1907 में विद्यार्थी जी आगे की पढ़ाई के लिए कायस्थ पाठशाला गये। इलाहाबाद प्रवास के दौरान विद्यार्थी जी की मुलाकात ‘कर्मयोगी‘ साप्ताहिक के सम्पादक सुन्दर लाल से हुई एवं इसी दौरान वे उर्दू पत्र ‘स्वराज्य‘ के संपर्क में भी आये। गौरतलब है कि अपनी क्रान्तिधर्मिता के चलते ‘स्वराज्य‘ पत्र के आठ सम्पादकों को सजा दी गई थी, जिनमें से तीन को कालापानी की सजा मुकर्रर हुई थी। सुन्दरलाल उस दौर के प्रतिष्ठित संपादकों में से थे। लोकमान्य तिलक को इलाहाबाद बुलाने के जुर्म में उन्हें कालेज से निष्कासित कर दिया गया था एवं इसी कारण उनकी पढ़ाई भी भंग हो गई थी। सुन्दरलाल के संपर्क में आकर विद्यार्थी जी ने ‘स्वराज्य‘ एवं ‘कर्मयोगी‘ के लिए लिखना आरम्भ किया। यहीं से पत्रकारिता एवं क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रति उनकी आस्था भी बढ़ती गई।
इलाहाबाद से गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ कानपुर आये एवं इसे अपनी कर्मस्थली बनाया। कानपुर में कलकत्ता से अरविंद घोष द्वारा सम्पादित ‘वन्देमातरम्‘ ने विद्यार्थी जी को आकृष्ट किया एवं इसी दौरान उनकी मुलाकात पं0 पृथ्वीनाथ मिडिल स्कूल के अध्यापक नारायण प्रसाद अरोड़ा से हुई। अरोड़ा जी की सिफारिश पर विद्यार्थी जी को उसी स्कूल में अध्यापक की नौकरी मिल गई। पर पत्रकारिता की ओर मन से प्रवृत्त विद्यार्थी जी का मन यहाँ भी नहीं लगा और नौकरी अन्ततः छोड़ दी। उस समय महावीर प्रसाद द्विवेदी कानपुर में ही रहकर ‘सरस्वती‘ का सम्पादन कर रहे थे। विद्यार्थी जी इस पत्र से भी सहयोगी रूप में जुड़े रहे। एक तरफ पराधीनता का दौर, उस पर से अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचार ने विद्यार्थी जी को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने पत्रकारिता को राजनैतिक चेतना को जोड़कर कार्य करना आरम्भ किया। इसी दौरान वे इलाहाबाद लौटकर वहाँ से प्रकाशित साप्ताहिक ‘अभ्युदय‘ के सहायक संपादक भी रहे। पर विद्यार्थी जी का मनोमस्तिष्क तो कानपुर में बस चुका था, अतः वे पुनः कानपुर लौट आये। कानपुर में विद्यार्थी जी ने 1913 से साप्ताहिक ‘प्रताप’ के माध्यम से न केवल क्रान्ति का नया प्राण फूँका बल्कि इसे एक ऐसा समाचार पत्र बना दिया जो सारी हिन्दी पत्रकारिता की आस्था और शक्ति का प्रतीक बन गया। प्रताप प्रेस में कम्पोजिंग के अक्षरों के खाने में नीचे बारूद रखा जाता था एवं उसके ऊपर टाइप के अक्षर। ब्लाक बनाने के स्थान पर नाना प्रकार के बम बनाने का सामान भी रहता था। पर तलाशी में कभी भी पुलिस को ये चीजें हाथ नहीं लगीं। विद्यार्थी जी को 1921-1931 तक पाँच बार जेल जाना पड़ा और यह प्रायः ‘प्रताप‘ में प्रकाशित किसी समाचार के कारण ही होता था। विद्यार्थी जी ने सदैव निर्भीक एवं निष्पक्ष पत्रकारिता की। उनके पास पैसा और समुचित संसाधन नहीं थे, पर एक ऐसी असीम ऊर्जा थी, जिसका संचरण स्वतंत्रता प्राप्ति के निमित्त होता था। ‘प्रताप‘ प्रेस के निकट तहखाने में ही एक पुस्तकालय भी बनाया गया, जिसमें सभी जब्तशुदा क्रान्तिकारी साहित्य एवं पत्र-पत्रिकाएं उपलब्ध थी। यह ‘प्रताप’ ही था जिसने दक्षिण अफ्रीका से विजयी होकर लौटे तथा भारत के लिये उस समय तक अनजान महात्मा गाँधी की महत्ता को समझा और चम्पारण-सत्याग्रह की नियमित रिपोर्टिंग कर राष्ट्र को गाँधी जी जैसे व्यक्तित्व से परिचित कराया। चैरी-चैरा तथा काकोरी काण्ड के दौरान भी विद्यार्थी जी ‘प्रताप’ के माध्यम से प्रतिनिधियों के बारे में नियमित लिखते रहे। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा रचित सुप्रसिद्ध देशभक्ति कविता ’पुष्प की अभिलाषा’ प्रताप अखबार में ही मई 1922 में प्रकाशित हुई। बालकृष्ण शर्मा नवीन, सोहन लाल द्विवेदी, सनेहीजी, प्रताप नारायण मिश्र इत्यादि ने प्रताप के माध्यम से अपनी देशभक्ति को मुखर आवाज दी।
विद्यार्थी जी एक पत्रकार के साथ-साथ क्रान्तिधर्मी भी थे। वे पहले ऐसे राष्ट्रीय नेता थे जिन्होंने काकोरी षडयंत्र केस के अभियुक्तों के मुकदमे की पैरवी करवायी और जेल में क्रान्तिकारियों का अनशन तुड़वाया। कानपुर को क्रान्तिकारी गतिविधियों का केन्द्र बनाने में विद्यार्थी जी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। सरदार भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, विजय कुमार सिन्हा, राजकुमार सिन्हा जैसे तमाम क्रान्तिकारी विद्यार्थी जी से प्रेरणा पाते रहे। वस्तुतः प्रताप प्रेस की बनावट ही कुछ ऐसी थी कि जिसमें छिपकर रहा जा सकता था तथा फिर सघन बस्ती में तलाशी होने पर एक मकान से दूसरे मकान की छत पर आसानी से जाया जा सकता था। बनारस षडयंत्र से भागे सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य प्रताप अखबार में उपसम्पादक थे। बाद में भट्टाचार्य और प्रताप अखबार से ही जुड़े पं0 राम दुलारे त्रिपाठी को काकोरी काण्ड में सजा मिली। भगत सिंह ने तो ‘प्रताप‘ अखबार में बलवन्त सिंह के छद्म नाम से लगभग ढाई वर्ष तक कार्य किया। सर्वप्रथम दरियागंज, दिल्ली में हुये दंगे का समाचार एकत्र करने के लिए भगत सिंह ने दिल्ली की यात्रा की और लौटकर ‘प्रताप’ के लिए सचिन दा के सहयोग से दो कालम का समाचार तैयार किया। चन्द्रशेखर आजाद से भगत सिंह की मुलाकात विद्यार्थी जी ने ही कानपुर में करायी थी, फिर तो शिव वर्मा सहित तमाम क्रान्तिकारी जुड़ते गये। यह विद्यार्थी जी ही थे कि जेल में भंेट करके क्रान्तिकारी राम प्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा छिपाकर लाये तथा उसे ‘प्रताप‘ प्रेस के माध्यम से प्रकाशित करवाया। जरूरत पड़ने पर विद्यार्थी जी ने राम प्रसाद बिस्मिल की माँ की मदद की और रोशन सिंह की कन्या का कन्यादान भी किया। यही नहीं अशफाकउल्ला खान की कब्र भी विद्यार्थी जी ने ही बनवाई।
विद्यार्थी जी का ‘प्रताप‘ तमाम महापुरूषों को भी आकृष्ट करता था। 1916 में लखनऊ कांग्रेस के बाद महात्मा गाँधी और लोकमान्य तिलक इक्के पर बैठकर प्रताप प्रेस आये एवं वहाँ दो दिन रहे। 1925 के कानपुर कांग्रेस अधिवेशन के दौरान विद्यार्थी जी स्वागत मंत्री रहे और जवाहर लाल नेहरू के साथ-साथ घोड़े पर चढ़कर अधिवेशन स्थल का भ्रमण करते थे। यह विद्यार्थी जी ही थे जिन्होंने श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद‘ को प्रताप प्रेस में रखा एवं उनके गान ‘राष्ट्र पताका नमो-नमो‘ को ‘झण्डा ऊँचा रहे हमारा‘ में तब्दील कर दिया। विद्यार्थी जी सिद्धांतप्रिय व्यक्ति थे। एक बार जब ग्वालियर नरेश ने उन्हें सम्मानित किया और कहा कि मुझे खुशी है कि आपके पिताजी मेरे अंतर्गत मुंगावली में कार्यरत रहे हैं, परन्तु आप मेरे बारे में अपने अखबार में लगातार विरोधी खबरें छाप रहे हैं। तो विद्यार्थी जी ने निडरता से कहा कि मैं आपका और पिताजी के आपसे सम्बन्धों का सम्मान करता हूँ, परन्तु इसके चलते अखबार के साथ अन्याय नहीं कर सकता। हाँ, यदि आप इन खबरों का प्रतिवाद लिखकर भेजेंगे तो अवश्य प्रकाशित करूँगा।
कालान्तर में विद्यार्थी जी गाँधीवादी विचारधारा से काफी प्रभावित हुए एवं यह उनकी लोकप्रियता का भी सबब बना। वे क्रान्तिकारियों एवं गाँधीवादी विचारधारा के अनुयायियों के लिए समान रूप से प्रिय थे। इस बीच अंग्रेजी हुकूमत ने 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया तो भारतीय जनमानस आगबबूला हो उठा। अंगे्रजी निर्दयता के विरूद्ध जनमानस सड़कों पर उतर आया। निडर एवं साहसी व्यक्तित्व के धनी तथा साम्प्रदायिकता विरोधी विद्यार्थी जी इस दौरान भड़के हिन्दू-मुस्लिम दंगों को शान्त कराने के लिए लोगों के बीच उतर पड़े। उधर विद्यार्थी जी के प्रताप से अंग्रेजी हुकूमत भी भयभीत थी। रायबरेली में मंुंशीगंज गोली काण्ड के तहत ‘प्रताप‘ पर मानहानि का केस चल रहा था और अंग्रेज बार-बार यह संदेश दे रहे थे कि जब तक कानपुर में ‘प्रताप‘ जीवित है, तब तक प्रदेश में शान्ति स्थापना मुश्किल है। भड़की हिंसा को काबू करने के दौरान 25 मार्च 1931 को विद्यार्थी जी साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़ गए। उनका शव अस्पताल की लाशों के मध्य पड़ा मिला। वह इतना फूल गया था कि उसे पहचानना तक मुश्किल था। नम आँखों से 29 मार्च को विद्यार्थी जी का अन्तिम संस्कार कर दिया गया पर ‘प्रताप‘ के माध्यम से ‘विद्यार्थी‘ जी ने राजनैतिक आन्दोलन, क्रान्तिकारी चेतना, क्रान्तिधर्मी पत्रकारिता एवं साहित्य को जो ऊँचाईयाँ दीं, उसने उन्हें अमर कर दिया एवं इसकी आंच में ही अन्ततः स्वाधीनता की लौ प्रज्जवलित हुई।
- कृष्ण कुमार यादव
गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009
समाज सेवा - लघुकथा (डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर)
श्रीमान जी व्यवस्था की अव्यवस्था से लड़ते-लड़ते जब हार गये तब गहन अंधकार के बीच विकास की नई रोशनी उन्हें दिखलाई दी या कहिये कि उनके मन-मष्तिष्क में प्रस्फुटित हो गई। आनन-फानन में एक संस्था का गठन, शहर के बीचोंबीच शानदार कार्यालय, क्षेत्रीय विधायक जी द्वारा उदघाटन, दो-चार फोटो, फ्लैश, पत्रकार और फिर समाचार-पत्रों में सुर्खियाँ।
नेताजी का भाव-विभोर करता भाषण और श्रीमान जी के हृदय को छूने वाले उद्देश्य; संस्था के गठन का उद्देश्य, ग्रामीणों, असहायों के विकास को संकल्पित निश्चय। सभी कुछ लाजवाब, सभी कुछ सराहनीय।
श्रीमान जी का कार्य प्रारम्भ हो चुका था। सुबह से अपने तीन-चार चेलों के साथ पास की ग्रामीण बस्ती में जाते, लोगों को कुछ बताते, बहुत कुछ समझाते और काफी कुछ पाते। इधर-उधर के फंड, इधर-उधर की योजनाएँ, ऊपर-नीचे के लोगों का वरद्हस्त, आगे-पीछे करने में महारथ.....बस विकास-यात्रा चल निकली, चेतना की लहर दौड़ उठी।
विकास होने लगा, श्रीमान जी पैदल से गाड़ी पर आ गये, घर से कोठी हो गई, पंखों से ए0सी0 हो गये पर क्षेत्र को वे नहीं भूले, ग्रामीण, असहायों को भी पीछे नहीं छोड़ा। इन सभी का भी विकास हुआ....दिहाड़ी काम करने वाले, छोटे-छोटे खेतों में काम करने वाले अब धन्ना सेठों के यहाँ बँधुआ मजदूर थे। रात को झोपड़ी की जमीन अथवा टूटी खाट पर सोने वालीं महिला मजदूर अब सफेदपोशों के पलंग की चादर बन गईं। असहाय महिलाओं के लिए महिला आवास बनाया गया ताकि पराजित पुरुषत्व पोसने को स्थायी साधन मुहैया हो सके।
विकास यात्रा रुकी नहीं, अनवरत जारी रही और श्रीमान जी......श्रीमान जी राज्यपाल द्वारा सर्वश्रेष्ठ समाजसेवी के रूप में सम्मानित होने जा रहे हैं।
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009
झर -झर जीवन ---------( डा श्याम गुप्ता )
अविरल गति से बहते बहते ,जीवन की कविता कहता
जीवन क्या है ,मलयानिल -पुरवाई बहती रहती है
सुख दुःख आते रहते हैं ,यह दुनिया चलती रहती है
जीवन क्या है मंद मंद धुन पर ढलता संगीत है
जीवन लय है ताल है सुर है ,जीवन सुन्दर गीत है
प्रियतम-प्रिय का मिलना जीवन , साँसों का चलना है जीवन
मिलना और बिछुड़ना जीवन,जीवन हार ,जीत भी जीवन
कोइ कहता नर से जीवन,कोइ कहता नारी जीवन
नर-नारी जब सुसहमत हों,आताही तब घर में जीवन
जीवन तो बस इक कविता है,कवी जिसमें भरता है जीवन
सारा जग यदि कवी बनजाये,पल-पल मुस्काये ये जीवन
गीत का बनना, फूल का हंसना,रात का आना,दिन काजाना
नव कलियाँ अवगुंठन खोलें, भंवरों का मंडराना जीवन
चींटी-दल का पंक्ति में चलना,कमल दलों का खुलना-मुंदना
चलते -चलते रुकता खरहा ,मृग शावक का रुक-रुक चलना
जीवन तो है स्वयं सन्जीवनि,मरना भी तो इक नव-जीवन
मृत्यु का सन्देश यही है, फिर-फिर आना ही है जीवन
दुःख आये दुःख लगता जीवन,सुख में महकाए ये जीवन
जैसा मन का भाव रहे जो ,वैसा ही बन जाए जीवन
योगी का तो योग है जीवन,भोगी को तो भोग ही जीवन
माया अज्ञानी का जीवन ,मुक्ति-ज्ञान ज्ञानी का जीवन
मुक्ति का पाना है जीवन,भागावंलय होजाना जीवन
मुक्ति का सन्देश यही है ,फिर से मिले सुहाना जीवन
सोमवार, 19 अक्टूबर 2009
मेरा काम न हुआ तो, ....... छाप देंगे ---(कुलदीप कुमार मिश्र)
आजकल हर कस्बे हर नगर में हजारों पत्रकार बिना लिखे और बिना अखबार निकाले ही बड़ी-बड़ी 'तोपों' को डराते फिर रहे हैं। ये 'तोपें' भी डर जाती हैं और इन 'प्रेस' अर्थात अखबार वालों को कुछ न छापने के लिये उनका खर्चा-पानी दे देते हैं और अखबार बिना छपे ही खप जाता है।तोपें पूछती हैं- 'और मिश्रा जी अखबार कैसा चल रहा है?' 'कैसा क्या, चल ही नहीं रहा है बंद पड़ा है अभी फाइलिंग हो रही है' मिश्रा जी बताते हैं। 'क्यों?''अरे आप लोग अखबार को चलने ही कहां देते है। अभी तीन महीने पहले एक के.डी.ए. वाले श्रीवास्तव साहब के विभाग की एक स्टोरी छापी थी, कि दूसरे ही दिन बेचारे मेरे दफ्तर में मुंह के बल आकर पैरों पर गिर गये और मिठाई का डिब्बा मेरी तरफ बढ़ा दिया। वह उस मिठाई के डिब्बे में बीस हजार रुपये दे गए और कह गए कि 'मिश्रा जी काहे को कष्ट करते हो, अख़बार निकालने का। अखबार लिखोगे, छपवाओगे, बांटोगे, विज्ञापन बटोरोगे, कमीशन दोगे, पैसा वसूलोगे तब कहीं जाकर दो चार हजार पाओगे। भैया आपका ये छोटा भाई काहे के लिए अपने जूते घिस रहा है। जब छोटा भाई है तो बड़ा भाई क्यों चप्पलें चटकाए। हम हैं ना आपकी सेवा में। आप काहे अखबार निकालने का कष्ट करते हैं- सो तब से बंद पड़ा है। अब तो जब पैसे की दरकार होती है तो किसी 'तोप' के पास चला जाता हूँ और कहता हूँ कि सहयोग करो नहीं तो अखबार निकालना पड़ेगा। ये 'तोप' लोग बहुत ही भले लोग होते हैं, सहयोग की भावना इनमें कूट-कूट कर भरी होती है।
अपने अकबर इलाहाबादी जी को लोग सही अर्थों में नहीं लेते, उन्होंने तो बहुत साफ-साफ कहा है कि- गर तोप मुकाबिल हो तो...अखबार निकालो। अब भाई साहब तोप मुकाबिले में ही नहीं आती है तो फिर बिना वजह क्यों अखबार निकालें।''तोप' मिश्रा जी के इस आख्यान पर विचार मग्न हो जाए इसके पहले ही वे पुन: निवेदन करते हैं 'भाई साहब एक कष्ट देने आया था। ये तिवारी जी हमारे रिश्तेदार बराबर है, आपके ही विभाग में मुलाजिम है कई वर्षों से देहात क्षेत्र में सड़ रहे हैं बिचारे। इनका तबादला यहीं शहर में ही करवा दें तो बड़ी कृपा होगी। आप जैसी दिव्य मूर्तियों के दर्शनों का सौभाग्य मिलता रहेगा नहीं तो फिर उसी साले अखबार में घुसना पड़ेगा और उसमें लिख कर उसे छापना पड़ेगा।''तोप' मिश्रा जी का काम कर देती है।तिवारी जी भी मिश्रा जी का 'काम' कर देते हैं। हम कभी भी अखबार निकाल सकते हैं, इसलिए हमसे डरो, नहीं तो अख़बार निकाल देंगे - ऐसा आदेश देते हुए हर नगर कस्बे में डायरी दबाये अनेक लम्बे कुर्ते वाले मिल जाएंगे जो केवल होली, दिवाली, पंद्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी को स्थानीय टुकड़ों की फूहड़ कविताओं और त्यौहारों की तरह मिलने वाले सरकारी विज्ञापन के साथ अखबार इसलिए छापते हैं कि वह लोग समाज की नजर में रहें ताकि वक्त जरूरत पर अपना काम निकाला जा सके। अगर वह लोग ऐसा नहीं करेंगे तो उनको और उनके अखबार को लोग भूल जायेंगे। समाज में अपनी पहचान बनाये रखने के लिये दैनिक अखबार को २ या ३ महीने में १ या २ बार किसी तरह से कुछ भी लिखकर उसे छपवा देते हैं। इन 'प्रेस' वालों अर्थात अखबारों वालों का अखबार छपता है तो इनका फायदा, नहीं छपता है तो इनका फायदा। तो अखबार छाप कर अपना बेवजह खर्चा क्यों बढ़ायें जब बिना अखबार छपे ही अपने सारे काम हो जाते हैं।चूंकि किसी के मुंह पर तो लिखा नहीं रहता कि ये अखबार निकालते हैं सो वे अपनी मोटर बाइक और स्कूटरों पर 'प्रेस' लिखवा लेते हैं- बड़े-बड़े मोटे-मोटे अक्षरों में। इस 'प्रेस' का यह मतलब नहीं है कि हम अखबार वाले हैं अपितु इसका मतलब है कि हम अखबार निकाल सकते हैं। ट्रैफिक के कांस्टेबलों, वर्जित क्षेत्र में प्रवेश कराने वालों, स्कूटर चुराने वालों, चेन स्नैचरों अगर पढ़े-लिखे हो और पढ़ सकते हो तो पढ़ लो कि हम वह हैं जो कभी भी अखबार निकाल सकते हैं इसलिये हमारा भी ध्यान रखना। नहीं निकाल रहे हैं तो इसके लिये हमारा अहसान मानना चाहिये। यह लोकतंत्र का चौथा पाया है जो हमने उपर उठा रखा है अभी। अगर...टिका दिया तो लोकतंत्र चौपाया होकर जम जाएगा। अभी तीन हिस्सों में है, हमें टिकने को मजबूर मत करो। तुम अपनी मन मर्जी करो और हमारा ध्यान रखो, नहीं तो हम टिक जाएंगे। हम टिक नहीं पाए इसलिए हमें बिकते रहने दो। अखबार निकालने वालों की तुलना में अखबार न निकालने वालों से 'तोपें' ज्यादा डरती हैं। अब जो अखबार निकाल ही रहा है उसे तो हजारों दूसरे काम होते हैं और उसे तो किसी तरह निकालना जरूरी है इसलिये उसका ध्यान केवल अपने अखबार निकालने की तरफ रहता है, लेकिन अखबार न निकालने वाले तो बाल की खाल और ढोल की पोल में घुसने के लिए जगह तलाशते रहते हैं। भूखे भेडिय़ों की तरह यहां वहां पहुंचने की कोशिशें करते हैं, जहाँ 'तोपों' के हित में उन्हें नहीं होना चाहिए। इसीलिए 'तोपों' की कोशिश रहती है कि इसका अखबार न निकले। इसीलिये ये 'तोपें' अखबार वालों को समय-समय पर भला किया करती हैं और उनकी पत्तेचाटी भी।अखबार निकालने वालों की तुलना में अखबार न निकालने वालों की सक्रियता देखते ही बनती है। अखबार निकालने वालों की तुलना में सभी चिंताओं से मुक्त अखबार निकालने वाले प्रभावशाली नेताओं के ईद-गिर्द ही घूमते रहते हैं। वे जनसंपर्क विभाग से निरंतर संपर्क रखते हैं। उन्हें ज्यादातर हमेशा यह पता होता है कि कब किसकी प्रेस कान्फ्रेंस कहां होने वाली है। अखबार निकालने वाले जब चुटीले प्रश्न खोज रहे होते हैं तब अखबार न निकालने वाले गर्म समोसों की खुशबू सूंघ रहे होते हैं। कोल्ड ड्रिंक की बोतलों के ढक्कनों के खुलने की प्रतीक्षा में होते हैं। वहां उपहार स्वरूप मिलने वाले उपहारों की संभावनाओं को तलाश रहे होते हैं, उनका मूल्यांकन कर रहे होते हैं। उस समय ये न तो प्रेस वाले होते हैं न ही अखबार निकालने वाले, उस समय ये सिर्फ खाने वाले होते हैं वह भी हराम का। अगर उनको अपने पेट भरने में कोई समस्या आड़े आती है तो बड़ा सा मुंह खोल कर बोलते हैं कि 'हमसे डरो, हम अखबार वाले हैं। मेरा मेरा काम नहीं हुआ (पेट नहीं भरा) तो हम अखबार छाप देंगे।'
गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009
सफ़र में हूँ अब तो सफर काटता है (जतिन्दर परवाज़)
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009
स्वप्न .यह धरती का है -----------(किशोर कुमार)
स्वप्न .यह धरती का है .
.
-गोल धरती ....
जैसे पानी की एक बूंद ...
उसके सपनों के महासागर से उछलकर ..
मछली की तरह मै ....
कहां जा पाता हू बाहर ......
-लौट आता हू ....
.शहर से गाँव ..
.गाँव में अपने घर आंगन ....
-फ़िर विचारो के जलाशय में ....
डूबे हुवे मन को ..
.ढूडने के लिए बैठा रहता हूँ ...
.बिछा कर एक जाल......
-स्वप्न यह धरती का है ....
पर डूबा रहता हूँ मै ...
कभी ..
.किसी के कश् में धुंवो सा छितरा कर अदृश्य हो जाता हूँ .....
कभी
..गरीब -फुटपाथ के किनारे सिक्को सा उछल जाता हूँ ..
..
-और फ़िर चढ़ने -उतरने के दर्द को पग-dndiyo सा ..
.पहाडे की तरह रटता हूँ मै ....
या
काँटों को फूल समझ कर
चलते पांवो को छालो सा -जीता हूँ मै ...
-मेरे स्वप्न में धरती ..कभी ..एक गोल हवाई झुला है .
.जहाँ से कूदना मना है ...
.मेरे स्वप्न में धरती -कभी -बदनाम पालीथीन से बनी
..अन्तरिक्ष के शहर में भटकती ...
हवा से भरी एक झिल्ली है ..
.जिसे छूना मना है ......
लेकिन क्या सचमुच में
मेरे स्वप्न में धरती -माटी के सत्य से निर्मित .....
.आकाश की थाल में प्रज्वलित .
.एक दिया है ..
.जिसमे जलती बा ती ने ..
.केवल प्रेम के अमृत को पिया है .................
लेकिन मेरे स्वप्न भी तो ..आख़िर धरती के ही है .........
-इसलिए ,....
.क्या धरती भी किसी का सपना है ...?
सोमवार, 12 अक्टूबर 2009
शिक्षा का बदलता स्वरूप----------(कुलदीप कुमार मिश्र)
बिना गुरु के ज्ञान असम्भव
वर्तमान समय में लोग कहते हैं कि गुरु व शिष्य के बीच सेवा भाव का लोप हो गया है। लेकिन ऐसा नहीं है। गुरु अपने शिष्य को विद्यालय से अलग बुलाकर विशेष तरीके से उसको शिक्षित करता है। शिष्य भी अपने कत्र्तव्य से पीछे नहीं हटता है। अपने गुरु व गुरुजी के घर के सारे कामों को बखूबी जिम्मेदारी से करता है। आधुनिक गुरु अर्थात अध्यापक लोग अपने शिष्यों यानी छात्रों के लिये विशेष शिक्षा केन्द्रजैसे कोचिंग सेण्टर व इंस्टीट्यूट जैसे कुटीर व लघु शिक्षा केन्द्रों (उद्योग धन्धों) का शुभारम्भ किया बल्कि उसे पूर्ण रूप से विकसित भी किया। इस प्रक्रिया को वह लोग निरन्तर प्रगति की ओर बढ़ाते भी जा रहे हैं।
हमारे देश में कई वेद, शास्त्र व पुराण अनेक विद्वानों द्वारा लिखे गये। लेकिन इस कोचिंग व्यवस्था पर कोई ग्रन्थ या पुराण नहीं लिखा गया। शास्त्रों की बखिया उधेडऩे वाले उन विद्वानों के लिए यह डूब मरने की बात है जिन्होंने वेदों में प्रमुख ऋगुवेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद और शास्त्रों और पुराणों में अग्निपुराण, भागवतपुराण, भविष्यपुराण, ब्रह्मपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, गरुणपुराण, कर्मपुराण, लिंगपुराण, मारकाण्डेय पुराण, मतस्यपुराण, नारद पुराण, नरसिह्मापुराण, पदमपुराण, शिवपुराण, स्कन्द पुराण, वैवत्रपुराण, वामन पुराण, वारहपुराण, विष्णुपुराण। लेकिन कलयुग के इस आधुनिक युग के लिये एक बेहद जरूरी व महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखना भूल गये। जिसका नाम मेरे हिसाब से कोचिंग सेण्टर या फिर लघु व कुटीर उद्योग शिक्षा-शास्त्र/पुराण होना चाहिये।
हमारे आधुनिक अध्यापक इस ग्रन्थ की उपयोगिता व आवश्यकता को समझते हुये इसकी नींव रख दी है। वे छात्रों को कोचिंग पढऩे के लिये अपने नवीनतम तरीकों से मजबूर करते रहते हैं।
इसके कई तरीके हैं- कक्षा में देर से आना, कक्षा में पहुँचकर माथा पकड़कर बैठ जाना। एकाध सवाल समझाकर सारे कठिन सवाल गृह-कार्य के रूप में देना। यदि छात्र कक्षा में कुछ पूछे तो - 'कक्षा के बाद पूछ लेना' कह देना। कक्षा के बाद पूछे तो 'घर आओ तब ही ढंग से बताया जा सकता है।' दूसरी विधि-छमाही परीक्षा में चार-पाँच को छोड़ बाकी छात्रों को फेल कर देना। फिर देखिए सुबह-शाम छात्रों की भीड़ अध्यापकों के घर में दिखने लगती है।
अभिभावक लोग अध्यापक से न जाने क्यों जलते हैं? जो अपनी ही आग में जला जा रहा है उस बेचारे से क्या जलना? राम तो विष्णु के अवतार थे उन्हें भी गुरु के घर जाना पड़ा। यह कारण था कि अल्पकाल में ही उन्होंने सारी विद्याएँ प्राप्त कर लीं थीं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी इस बात की पुष्टि की है- गुरु गृह गए पढऩ रघुराई। अल्पकाल विद्या सब पाई। जब भगवान का यह हाल था तो भला आज के छात्र की क्या औकात कि वह अपने विषय के अध्यापक से विशेष प्रकार की शिक्षा ग्रहण (ट्यूशन न पढ़े) न करे।
कलयुगी अध्यापकों ने अपनी काबिलियत और ज्ञान को बेचना अपना पेशा बना लिया है। ये कोचिंग सेण्टर के नाम से अपनी दुकानें चलाते हैं। कुछ लोग यह काम बड़े स्तर पर करते हैं। इसके लिये वे इंस्टीट्यूट नामक बड़े उद्योग की शुरूआत करते हैं।
इस प्रकार जब उनकी दुकानें चल निकलती हैं तो दो शिफ्टों में सुबह और शाम को वास्तविक पढ़ाई शुरू हो जाती है। गुरु जी पढ़ाते समय विभिन्न दैनिक एवं पारिवारिक कार्यों को भी संपन्न करते रहते हैं, अच्छा भी है-एक पंथ दो काज।
कुछ लोग कहते हैं कि छात्रों के हृदय से सेवा-भावना का लोप हो रहा है। इन गैर सरकारी 'कुटीर एवं लघु शिक्षा केन्द्रों व इंस्टीट्यूट जैसे बड़ी उद्योग फर्मों का निरीक्षण करें तो उन्हें अपनी विचारधारा बदल देनी पड़ेगी। सुबह के समय एक छात्र डेरी से दूध ला रहा है। दूसरा छात्र अपने गुरु के पुत्र को उसके विद्यालय पहुँचा रहा है। तीसरा छात्र गुरु पत्नी की सेवा में जुटा हैं और सिल पर मसाला पीस रहा है, चौथा छात्र घर की रसोई में सहायता कर रहा है। चक्की से गेहूँ पिसवा कर लाना, सब्ज़ी मंडी से सब्ज़ी लाना, धोबी के यहाँ मैले कपड़े भिजवाना, गुरु जी के लिए दुकान से बीड़ी-पान खऱीद कर लाना इन सभी कार्यों को छात्र ही संपन्न करते हैं। उसके बावजूद भी कुछ बुद्धिजीवी लोग यही कहते हैं कि छात्रों के हृदय से अपने गुरु अर्थात अध्यापक के प्रति सेवा-भावना का लोप हो रहा है। यह तो सरासर नाइन्साफी है छात्रों के साथ।
यदि सेवा भावना से गुरु प्रसन्न है तब भगवान भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। गुरु जी अगर नाराज है तो भगवान भी सहायता नहीं कर सकते। ज्ञान ध्यान स्नान के लिए एकांत होना आवश्यक है। कक्षा की भीड़-भाड़ में ज्ञान-चर्चा करना व्यर्थ है। आज हमारी सरकार शिक्षा-नीति के परिवर्तन पर बहुत ध्यान दे रही हैं। मेरी सलाह कोई माने तो 'हींग लगे न फिटकारी रंग चोखा चढ़े।' सब विद्यालय बंद करा दिए जाएं। भवन-निर्माण, फर्नीचर, वेतन सभी खर्च समाप्त। छात्रों के उज्जवल भविष्य व अच्छी पढ़ाई के लिये कुटीर एवं लघु उद्योग व शिक्षा-केंद्र चलाने के लिए धाकड़ अध्यापकों को प्रोत्साहित किया जाए। क्योंकि वर्तमान में जाने-अनजाने में हो तो यही रहा है। विद्यालय में छात्रों की संख्या भले ही कम हो लेकिन इन पढ़ाई के कुटीर एवं लघु उद्योग व शिक्षा-केंद्रों पर किसी विद्यालय के छात्रों की संख्या से यहां की संख्या कम नहीं होती। इस कारण अध्यापकों का भी कत्र्तव्य बनता है कि वह अपने प्रिय छात्रों का विशेष रूप से ध्यान रखें। आखिर वह बड़ी-बड़ी रकम ट्यूशन फीस के रूप में जो देते हैं। इसलिये अध्यापक अपने इस कत्र्तव्य पथ से जरा भी भ्रमित नहीं होते। अपना कार्य वे बखूबी निभाते हैं।
अपने प्रिय छात्र के लिए अध्यापक को कम पापड़ नहीं बेलने पड़ते हैं। परीक्षा कक्ष में नकल की विशेष छूट देना, पेपर आउट करना, कापी में नंबर बढ़ाना या घर जाकर कापी में लिखवाना। लिखित परीक्षा में दस प्रतिशत नंबर लाने वाले छात्र को प्रयोगात्मक परीक्षा में नब्बे प्रतिशत अंक दिलवाना आदि बहुत-सी सेवाएँ सम्मिलित हो जाती हैं।
यदि कोई सनकी अध्यापक इनके धंधे-पानी में बाधा बनता है तो ये विषैले साँप बनकर उसे डसने का मौका ढूँढ़ते रहते हैं। मुँह का ज़ायका बदलने के लिए ये चुगली का भी सहारा लेते हैं। यदि अर्ध-वार्षिक परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने वाले छात्रों को बोर्ड की परीक्षा से वंचित करने का नियम दिया जाए। इससे ट्यूशन के कुटीर उद्योग को प्रोत्साहन मिलेगा तथा धंधे की गिरती हुई प्रतिष्ठा को बल मिलेगा।
कानपुर कभी अनेक लघु एवं कुटीर उद्योग धन्धे व बड़े-बड़े कारखाने का केन्द्र माना जाता था। लेकिन समय के साथ वे सब तो बन्द हो गये लेकिन कानपुर वासियों ने उसकी अस्मिता को बचाये रखा। उन्होंने कोचिंग व ट्यूशन के बहाने से कुटीर एवं लघु उद्योग व शिक्षा-केन्द्रों का न कि शुभारम्भ किया बल्कि उसे पूर्ण रूप से विकसित भी किया। वर्तमान में कानपुर शिक्षा का केन्द्र माना जाने लगा है। कोचिंग सेण्टर व कुटीर एवं लघु उद्योग व इंस्टीट्यूट जैसी बहुत सी फर्में जो जगह-जगह हैं इस बात का प्रमाण हैं।
रविवार, 11 अक्टूबर 2009
दिल की बात है कविता---------" डा० श्याम गुप्त "
उठती है दिल में बात जो,मैं उसी का निबहगार हूं ।
ये दिल कभी जो मचल गया ।
वो गुबार उनकी याद का ,
यूं ज़ुबां पै आके फ़िसल गया।
कोई राष्ट्र हित कुछ कर गया।
कोई अपनी सारी ज़िन्दगी,
इन्सानियत पै लुटा गया ।
जो ज़ुबां से गीत फ़िसल गया।
वही नग्मे सुर में गा दिये ,
मैं न कोई कलमकार हूं ।
कुछ लोग जो झुक कर बिछगये,
कुछ चंद सिक्कों पे बिकगये ।
कुछ अहं में ही अकडे रहे ,
कुछ बंधनों में जकड गये।
ठेके सज़ायें, वे सब सुनें।
रट कर के चन्द विधाओं को,
खम ठोकते हैं वे सब सुनें।
हर वाक्य जिसमें है जन-निहित।
हर विधा संस्क्रित-देश हित,
उसी कविता,कवि का प्यार हूं।
न मैं कवि न.............................
मेंने बिगुल फ़ूंका काव्य का,
साहित्य की रची रागिनी ।
इतिहास ओ वीरों के स्वर,
रची धर्म की मंदाकिनी ।
इतना तो गुनहगार हूं ।
लिखदूं ,कहूं, गाता रहूं ,
इन्सान सदा बहार हूं ।
उठती है दिल में बात जो,मैं उसी का निबहगार हूं ॥
शनिवार, 10 अक्टूबर 2009
मेरे इस संसार को यारों किसने खाक बना डाला-------"कुलदीप कुमार मिश्र"
शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009
यूँ ही उदास है दिल--------जतिन्दर परवाज़
गुरुवार, 8 अक्टूबर 2009
प्रिये...................................कविता ( नीशू तिवारी )
आज तुम फिर क्यों ?
इतनी देर से आयी हो ,
तुम्हारे इंतजार में मैंने
कितने ही सपने सजाये
पर तुम्हारे बगैर ये कितने
अधूरे से हैं ।
मैंने तो कितनी ही बार
तुमसे शिकायत की
पर
तुमने हमेशा ही अपनी
मुस्कुराहट से ,
जीत लिया मुझे,
तुमसे इस तरह तुम्हारी शिकायत करना
अच्छा लगता है मुझे ,
प्रिये,
तुम्हारा इंतजार करते- करते
मैंनें बंद कर ली थी आंखें,
बंद आंखों में तुम्हारी
यादे तैरने लगी थी ,
एक उम्मीद थी कि
शायद इन यादों के साथ
नींद के आगोश में
समा जाऊं मैं ,
करवटें बदल- बदल कर
कोशिश की थी ,
रात भर सोने की
पर
सफल न हो सका था ।
कमरे के दरवाजे से
मंदिर के जलते दिये
की रोशनी ,
चांद की किरणों को
मद्धम कर रही थी ,
मैं तो चुपचाप ही ये
खेल देख रहा था ।
ऐसे में हवा के एक झोंके ने,
बुझा दिया था इस रोशनी को ,
जिसे देख मैं इंतजार कर रहा था तुम्हारा,
उस झोंके ने कोशिश की थी
मेरे विश्वास को तोड़ने की ,
पर मुझे पता है कि
तुम आओगी जरूर प्रिये ,
पर
देर से ही
और मैं
तुमसे करूंगा ढ़ेर सारी
शिकायतें
तुम चुप रह कर सुनती रहोगी
फिर
मुस्कराकर मेरा दिल जलाओगी
प्रिये ,
तुम्हारी ये अदा
मुझे सताती है ,
मेरे दिल को भाती है
इसलिए तो
तुम्हारा इंतजार करना
अच्छा लगता है ।
बुधवार, 7 अक्टूबर 2009
हिन्दी शब्द कहां से आया ?????????
मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009
मेरे प्यार के बदले----------------(किशोर कुमार खोरेन्द्र)
तुम मुझे
अपने मन मे रख लो
तुम्हारे अश्रु सारे पी जाउंगा
निहार लूँगा मै तुम्हे
जब देखोगी तुम दर्पण
तुम मुझे अपने नयन मे रख लो
तुम मुझे अपने स्मरण मे रख लो
तुम्हारी कल्पनाओ मे स्मृतियों का रंग बन जाऊँगा
आह्लादित हो जाउंगा तुम्हारी गरीमा से
तुम मुझे अपने शरण मे रख लो
तुम मुझे अपने सपनो के आँगन के कण -कण मे रख लो
बिछुड़ने न दूंगा प्रणय-पल को स्वप्न मे भी
मिट जाऊंगा मै भी संग तुम्हारे
तुम मुझे अपने निज समर्पण मे रख लो
आजमरण ,कल नूतन बचपन है
मेरे प्यार के बदले
हे प्रिये -
तुम मुझे -अपने साथ भावी -
अजन्मे
शाश्वत -नव अवतरण मे रख लो
तुम पवित्र परम साध्वी
जल दूषित हू परन्तु
संग तुम्हारे पावन गंगा हू
हे प्रिये
एक बूंद सा मुझे -अपने आचमन मे रख लो
धरती पर भागती बादलो की प्रतिछाया
तुम ...हो ...
यह प्रकृति और नित बदलती माया
दृश्य तुम
और मै दृष्टा
मेरे प्यार के बदले
मुझे अब
एक साक्षी -विरह मिलन का
हरदम
रख लो
सोमवार, 5 अक्टूबर 2009
ऎ मेरे मन ---------------
ए मेरे मन
ए मेरे मन......।
कौन है तेरा यहां, कौन है तेरा यहां ?
ए मेरे मन..ए मेरे मन..ए मेरे मन.........।
किसके तू गीत गुनुगुनाता है।
किसके वादों में लिपट कर खुद को खोया,
किसकी बातों में बहक करके गीत गाता है।
ए मेरे मन...एमेरे मन...ए मेरे मन............।
किसकी बाहों में लिपटने के सज़ाये सपने,
किससे मिलने की धुन सज़ाता है?
प्यार सिसका है ,हर ज़माने में।
ए मेरे मन...
ए मेरे मन.........॥
रविवार, 4 अक्टूबर 2009
बारिशों में नहाना भूल गए-------------(जतिन्दर परवाज़ )
शनिवार, 3 अक्टूबर 2009
तुम्हें याद करते ही --------{किशोर कुमार खोरेन्द्र }
शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009
मजबूर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी
महात्मा गांधी का नाम जपना और नीलाम होती उनकी नितांत निजी वस्तुओं को भारत लाना सरकार की मजबूरी है। महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी ने गांधी जी की वस्तुओं को भारत लाने का मुद्दा इतना उछाल दिया कि विशुद्ध मजबूरी में मनमोहन सिंह सरकार को सक्रिय होना पड़ा। लेकिन इस सक्रियता के पीछे कितनी उदासीनता थी, इसका पता सरकार और नीलामी में इन वस्तुओं को खरीदने वाले शराब- निर्माता और प्रसिद्ध उद्योगपति विजय माल्या के दावों- प्रतिदावों से साफ हो जाता है। सरकार बढ़-चढ़कर कह रही थी कि गांधी जी की ऐनक, थाली, कटोरा और चप्पलें आदि खरीदने के लिए अमेरिका में अपने दूतावास को उचित निर्देश दे दिए गए हैं। जब नीलामी में विजय माल्या ने वस्तुएं खरीद लीं, तब बढ़-चढ़कर फिर कहा गया कि माल्या ने सरकार के कहने पर ही ऐसा किया है।
इस दावे पर माल्या ने कहा कि मेरे फैसले का सरकार से कोई लेना-देना नहीं है। मैं फोन के जरिए नीलामी में भाग ले रहा था। सरकार ने मुझसे न तो नीलामी से पहले और न ही बाद में कोई संपर्क किया। अलबत्ता माल्या इन चीजों को खरीदकर संतुष्ट हैं और इन्हें भारत को सौंपना चाहते हैं। उनकी एक ही इच्छा है कि इन वस्तुओं को भारत लाने पर सीमा शुल्क आदि नहीं लगे। माल्या ने टीपू सुल्तान की तलवार को भी नीलामी में खरीदा था लेकिन अभी भी वह सैन फ्रांसिस्को में ही है। मौजूदा कानूनों के अनुसार राष्ट्रीय धरोहर की वस्तुओं को भारत लाने के लिए भी आयात लाइसंस लेना पड़ता है और उस पर सीमा शुल्क आदि चुकाना पड़ता है।
सरकार चूंकि गांधी की वस्तुओं को भारत लाने के मामले में उदासीन नहीं दिखना चाहती, इसलिए यह संभव है कि आनन-फानन में आयात लाइसंस दे दिया जाए और कस्टम ड्यूटी माफ कर दी जाए, लेकिन विजय माल्या को निश्चय ही कोई जल्दी नहीं होगी। होती तो वह कहते कि मैं खुद ड्यूटी का पैसा भी भरूंगा। तो क्या उनके लिए भी मजबूरी का नाम ही महात्मा गांधी है? अभी तक कहीं कोई ऐसा साक्ष्य नहीं है, जिसके आधार पर कहा जा सके कि भारत में शराब को बढ़ावा देने में अपना विनम्र कारोबारी सहयोग देनेवाले विजय माल्या मद्य निषेध के प्रबल पैरोकार महात्मा गांधी के विचारों और जीवन मूल्यों में कोई यकीन रखते हैं। गांधी के सादा जीवन-उच्च विचार वाले जीवन मूल्यों के विपरीत विजय माल्या भोगवाद के जीवंत प्रतीक हैं। आज ऐसे चिंतकों की कमी नहीं है जो मानते हैं कि दुनिया में अगर लोभ-लालच न होते तो इतनी भौतिक तरक्की न हुई होती।
विजय माल्या व्यापारी हैं और आप समझ सकते हैं कि उनकी तमाम ब्रैंडों-उत्पादों-सेवाओं को विज्ञापन की जरूरत हमेशा रहती है। गांधी की वस्तुओं में निवेश करना एक ऐसा स्थायी विज्ञापन हथिया लेना है, जो सालों काम आएगा। आपने देखा होगा कि शीतल पेय बनानेवाली कंपनियां क्रिकेट मैच स्पॉन्सर करती हैं तो सिगरेट बनानेवाली कंपनियां साहस और वीरता के लिए पुरस्कार बांटती हैं। इसलिए अगर एक शराब बनानेवाला व्यापारी गांधी जी को इस तरह भुनाता है तो कौन आपत्ति करने वाला है? आखिर वह देश के लिए तो एक नेक काम कर ही रहा है।
गांधी जी ने साध्य के लिए साधना को या कहें लक्ष्य के लिए उसके जरिए का भी निष्कलुष होना जरूरी बताया था। अपने मूल्यों से गांधी ने कभी समझौता नहीं किया। असहयोग आंदोलन उन्होंने इसलिए वापस लिया क्योंकि अंग्रेजों के दमन के विरोध में उनके समर्थक चौरी-चौरा में हिंसा पर उतर आए थे। जरा सोचिए कि गांधी अगर जीवित होते और ऐसा कोई अवसर उपस्थित होता तो क्या गांधी इस तरह वापस आने वाली अपनी निजी वस्तुएं स्वीकार करते?
गांधी जी के बारे में उनके पोते राजमोहन गांधी ने लिखा है कि शुरू में गांधी को भी खाने, पहनने, अच्छी जगह रहने और समुद्री तथा अन्य यात्राएं करने का शौक था। उनके जीवन में गीत-संगीत के लिए भी जगह रही है, लेकिन एक बार जब उन्होंने सादगी अपना ली तो उसे पूरी तरह जीवन में उतार लिया। गोलमेज सम्मेलन के लिए जब वे लंदन गए थे, तब उनसे एक अंग्रेज पत्रकार ने पूछा कि अगर कल नंगे बदन होने के कारण महारानी आपसे मिलने से मना कर दें तो क्या आप उचित कपड़े पहनेंगे। तो गांधी जी ने कहा था : नहीं, मैं ऐसे ही मिलूंगा। गांधी संग्रह के खिलाफ थे और वे हर वस्तु का न्यायपूर्ण उपयोग करने के पक्षधर थे। समृद्धि की जगह सादगी और समानता। उनका गांधीवाद एक तरह से मार्क्सवाद की तरह ही एक यूटोपिया है, जिसे कोई देश अपने जीवन में उतार नहीं सकता। यही कारण है कि गांधीवाद को उनके पट्ट शिष्य जवाहरलाल नेहरू ने अपने मिश्रित अर्थव्यवस्था और उद्योगीकरण के प्रयोगों पर आधारित नेहरूवाद से विस्थापित कर दिया।
मनमोहन सिंह ने 1990 के दशक में अपनी नई आर्थिक नीतियों से गांधीवाद के ताबूत में अंतिम कील ठोक दी और गांधी आज मुक्कमिल तौर पर पूजा की वस्तु बना दिए गए हैं। आज गांधी के विचारों की नहीं उनकी वस्तुओं की जरूरत है क्योंकि विचार नहीं वस्तुएं गांधीवाद की झलक दिखानेवाली रोशनियां मान ली गई हैं- व्यक्ति नहीं मूर्ति, उसकी वस्तुएं, उसके प्रतीक ।
आप खुद सोचकर देखिए कि देश में क्या एक भी ऐसी राजनैतिक पार्टी है, जिसका गांधीवाद में जरा भी विश्वास हो। लेकिन गांधी का नाम लिए बगैर किसी का काम नहीं चल सकता। इसलिए बीजेपी जैसी उस परिवार की पार्टी भी जो गांधी जी के हत्यारों के साथ विचार-साम्य रखती है, गांधीवादी मानवतावाद का नाम जपती हैं और उसके अध्यक्ष राजनाथ सिंह कहते हैं कि गांधी की विरासत के असली वाहक तो हम हैं। कांग्रेस का आलम तो यह है कि वहां एक प्रतीक के रूप में भी गांधी टोपी दुर्लभ प्रजाति की वस्तुओं में शामिल हो गई है। तो क्या आपको नहीं लगता कि गांधी का नाम लेना हमारी पार्टियों के लिए विशुद्ध एक मजबूरी है? हमारी पार्टियों ने गांधी के खिलाफ अपनी-अपनी तरह से वीर सावरकर, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह और डॉ. भीमराव आंबेडकर को भी खड़ा करने की कोशिश की। लेकिन कोई भी गांधी से बड़ा साबित नहीं हुआ क्योंकि गांधी जहां एक ओर बिल्कुल अकेले और सबसे अलग हैं, वहीं दूसरी ओर ये सब उनमें उतने ही समाहित भी हैं। इसलिए गांधी अगर एक स्तर पर निरापद हैं तो दूसरे स्तर पर खतरनाक भी हैं।
हमने बड़ी चतुराई से निरापद गांधी को चुना है- एक आभासी गांधी को, उनकी जड़ वस्तुओं को, जो बदले जाने का आभास तो देती हैं लेकिन बदलाव नहीं लातीं। जैसे 'लगे रहो मुन्ना भाई' मार्का फिल्में जो पर्दे पर चमत्कार करती हैं और जीवन में मनोरंजन। हमारे राजनेताओं को भी गांधी नहीं उनकी थाली और कटोरा, ऐनक और घड़ी चाहिए।