जब भी ,
दरख्तों पर बैठे पंछियों की तरह
मैंने चहचहाना चाहा ;
जब भी,
फूलों पर बैठे भंवरों की तरह
मैंने गुनगुना चाहा ;
जब भी,
बागों में खिलते फूलों की तरह
मैंने मुस्कुराना चाहा ;
जब भी ,
इस शहर में रहने के लिए
मैंने इक आशियाना चाहा ;
इस शहर में रहने के लिए
मैंने इक आशियाना चाहा ;
जब भी,
एक पागल प्रेमी की तरह
मैंने उसे पाना चाहा ;
हर बार, रहा खामोश
हर बार,हुआ मजबूर
हर बार, लौटा नाकाम
हर बार, पुछा गया
मुझसे मेरा मज़हब !!
मर्मस्पर्शी कविता. वाकई साम्प्रदायिकता हमारी रगों में खून बनकर प्रवाहित होने लगी है. प्रेम तक में हिन्दू-मुस्लिम छूत-अछूत देखे जाने लगे हैं. यह तेवर बने रहें. बधाई.
जवाब देंहटाएंbahut khub sundar rachna
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