अभी भी मन को मोह लेते हैं
फूल, पत्ते और मौसम
अभी भी कोशिश करता हूँ उनसे संवाद करने की
अभी भी मुग्ध कर देती है हैं खिली हुयी मानव छवियाँ
और मैं गुनगुनी झील में उतराने लगता हूँ
अभी भी आते हैं बाल्यवस्था के सपने
और मैं नदी में नाव सा बहने लगता हूँ
अभी भी भौंरे व चिडियों का संगीत
बज उठता है धीरे से कानों में
और मैं सितार सा झनझना जाता हूँ
अभी भी उपन्यासों के के पात्रों,
फिल्मी चरित्रों का दर्द
उनका घायल एकाकीपन
मुझे देर तक उदास कर जाता है
अभी भी इसका उसका जाने किस किसका
क्रूर और फूहड़ सुख
मेरे अंतर्मन को क्रोध से उत्तेजित कर देता है
अभी भी अक्सर मुझे आईना फटकार लगा देता है
अभी भी मौका मिलते ही ठहाके लगाना नहीं भूलता
यारों क्या अजीब बात है
मालूम होता है कि इस उम्र में भी
मैं जिन्दा हूँ औरों से थोडा ज्यादा !!!!!
sundar rachna
जवाब देंहटाएंइस साईट के आयोजकों के लिए--आप की इस साईट पर लाल रंग के background में कमेन्ट करने का बटन छुप गया है.कमेन्ट भेजें[atom] पर क्लिक करते हैं तो फीड पर ले जाता है.माउस को घुमा कर खोजा है तब जा कर यह सही बटन हाई लाइट हुआ--यह बहुत बड़ी कमी है..इसे तुंरत ठीक कर लिजीयेगा.
जवाब देंहटाएंक्योंकि जब कमेन्ट का बटन नहीं दिखेगा तो पाठक कैसे टिप्पणी करेगा?
abhaar sahit-Alpana
प्रकाश जी की कविता आशावादी कविता है,इस में जीवन दिखता है.
जवाब देंहटाएंसमझ के परिपक्व होने पर भी कई बार भावों के उतार चढाव मन को प्रभावित कर जाते हैं.मन भीतर से अपने बचपन का दामन कभी छोड़ता नहीं है.इस लिए भी कभी कभी भावों में बह जाना स्वाभाविक है.
सशक्त अभिव्यक्ति,भावपूर्ण रचना हेतु बधाई.
bahut hi sundar kavita .
जवाब देंहटाएंbahut khub sir ji acchi bhavna
जवाब देंहटाएंएक सार्थक सशक्त सुन्दर रचना है आभार शुभ्कामनायें
जवाब देंहटाएंअभी भी मन को मोह लेते हैं baut acchi kavita hai prkash ji
जवाब देंहटाएंअभी भी मन को मोह लेते हैं jeevan ka sach hai prkash ji
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