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रविवार, 12 अप्रैल 2009

"कल शाम". सतीश चन्द्र सत्यार्थी

कल शाम
गिर के बिखर गए थे,

बालकनी में,
नीम के कुछ सूखे पत्ते,
ज्यों तेरी खिलखिलाती हंसी

टटकी धूप की एक किरण
खिड़कियों से आकर,
नींद में छू गयी थी माथे को
ज्यों तेरा भींगा स्पर्श

दीवाल-घड़ी भी गिर कर फर्श पर
ज़रा अटक गयी थी
ज्यों तेरे रूठने की अदा

छत की मुंडेर पर आकर ठहर गयी थी,
इतराती सोंधी शाम
ज्यों तेरा खिड़की पे आके ठहर जाना

महुए के पीछे से चाँद,
और शाखों से लिपटी चांदनी ने
देखा था तिरछी नजरों से
ज्यों तेरा शोख निगाहों से देखना

सांझिल हवा का एक झोंका,
जबरन घुस आया था कमरे में
ज्यों तुम्हारी याद।

कल शाम

सतीश चन्द्र सत्यार्थी
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय नई दिल्ली, भारत।

2 टिप्‍पणियां:

  1. सतीश जी , सर्वप्रथम आपका हिन्दी साहित्य मंच आगमन पर बहुत बहुत स्वागत हैं । अपनी रचना के माध्यम से हमारे प्रयास में भागीदारी कर सहयोग और उत्साहवर्धन किया है इसके धन्यवाद । आपकी रचना सुन्दर बनी हैं । कल्पनाशीलता शब्द के माध्यम से अमिट छाप छोड़ रही है । भविष्य के लिए शुभकामनाएं ।

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  2. सतीश जी , बहुत ही सुन्दर रचना आपने प्रस्तुत की है । आपकी कल्पनाशीलता से सुन्दर दृश्य को जीवंत कर दिया है । पढ़कर सुखद अनुभूति हुई । बधाई

    जवाब देंहटाएं

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