तुमको तो जाना ही होगा,
लेकिन क्या यह भी सोचा है -
दर्द हमारा कौन सहेगा ?
तपते मरुथल में पुरवाई
के झोंके अब क्या आएँगे ?
रुँधे हुए कंठों से कोकिल
गीत मधुर अब क्या गाएँगे ?
तुमको तो गाना ही होगा,
लेकिन क्या यह भी सोचा है -
अब उस लय में कौन बहेगा ?
यह कैसा बसंत आया है ?
हरी दूब में आग लगा दी !
निंदियारे फूलों की खातिर
उफ्! काँटों की सेज बिछा दी !
इसको अपनाना ही होगा,
लेकिन क्या यह भी सोचा है -
आशाओं का महल ढहेगा।
एक बार फिर छला भँवर ने,
डूब गई मदमाती नैया।
एक बार फिर बाज समय का
लील गया है नेह चिरैया।
मन को समझाना ही होगा,
लेकिन क्या यह भी सोचा है -
प्रणय-कथा अब कौन कहेगा ?
virah vedna me dubi sundar rachna ...
जवाब देंहटाएंलाजवाब नागेश जी...बहुत ही सुंदर प्रेम की अभिव्यक्ति....प्रेमी ह्रदय का वेदनामय गीत।
जवाब देंहटाएंprabhavsali kavita... apna asar chhod rahi hai..
जवाब देंहटाएंबेहद खूबसूरत प्रस्तुति।
जवाब देंहटाएंआपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (12.02.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.uchcharan.com/
जवाब देंहटाएंचर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)
थाह और प्रवाह का सुन्दर संगम।
जवाब देंहटाएंबेहद ही सुन्दर। विरह के भावों को बखुबी समेटा है आपने।
जवाब देंहटाएंलेकिन क्या यह भी सोचा है -
जवाब देंहटाएंप्रणय-कथा अब कौन कहेगा ?....
सुन्दर और भावपूर्ण गीत । बधाई।
एक-एक शब्द भावपूर्ण ..... बहुत सुन्दर...
जवाब देंहटाएंगहरी संवेदनशील रचना .
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर प्रस्तुति
bhawbhinee.
जवाब देंहटाएंतुमको तो जाना ही होगा,
जवाब देंहटाएंलेकिन क्या यह भी सोचा है -
दर्द हमारा कौन सहेगा ?
प्रणय-कथा अब कौन कहेगा ?
बहुत अच्छी रचना है ।
वेदना की सुन्दर अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंआज अचानक अपनी यह रचना और विद्वानों की सुन्दर टिप्पणियां देखीं, इस स्नेहिल प्रोत्साहन के लिए मैं आप सभी का आभारी हूँ.
जवाब देंहटाएं