तू परछाई है मेरी, तो कभी मुझे भी दिखाई दिया कर
ऐ जिंदगी ! कभी तो इक जाम फुर्सत में मेरे संग पिया कर
मै भी इन्सान हूँ, मेरे भी दिल में बसता है खुदा
मेरी नहीं तो न सही, कम से कम उसकी तो क़द्र किया कर
इनायत समझ कर तुझको अबतलक जीता रहा हूँ मै
मिटा कर क़ज़ा के फासले, मै तुझमे जियूं तू मुझमे जिया कर
मेरा क्या है ? मै तो दीवाना हूँ इश्क-ऐ-वतन में फनाह हो जाऊंगा
वतन पे मिटने वालों की न जोर आजमाइश लिया कर...........
वाह संतोष कुमारजी.. क्या खूब लिखा है आपने..
जवाब देंहटाएंबहुत ही ज़बरदस्त प्रस्तुति...
आभार
काश जिन्दगी को तनिक फुर्सत भी होती।
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर..हरेक शेर लाज़वाब..कहाँ फुर्सत है जिंदगी को सुकून से एक जाम पीने की...
जवाब देंहटाएंlazavab prastuti.....
जवाब देंहटाएंबहुत ही अच्छी लगी आपकी रचना और आपके ख्याल...
जवाब देंहटाएंलाजवाब रचना संतोष जी ।
जवाब देंहटाएंबढ़िया गजल!
जवाब देंहटाएंलोहड़ी और उत्तरायणी की सभी को शुभकामनाएँ!