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बुधवार, 12 मई 2010

कुछ क्षणिकाएं..........मनोशी जी


दो अश्रु

एक अश्रु मेरा
एक तुम्हारा
ठहर कर कोरों पर
कर रहे प्रतीक्षा
बहने की
एक साथ

रात

पिघलती जाती है
क़तरा क़तरा
सोना बन कर निखरने को,
कसमसाती है
ज़र्रा ज़र्रा
फूल बन कर खिलने को,
हर रोज़
रात

दो बातें

दो बातें,
एक चुप
एक मौन
कर रहे इंतज़ार
एक कहानी बनने की

अजनबी

चलो फिर बन जायें अजनबी
एक नये अनजाने रिश्ते में
बँध जायें फिर,
नया जन्म लेने को

सप्तऋषि

जुड़ते हैं रोज़
कई कई सितारे
बनाने एक सप्तऋषि
हर रात
हमारे बिछड़ने के बाद

11 टिप्‍पणियां:

  1. दो बातें,
    एक चुप
    एक मौन
    कर रहे इंतज़ार
    एक कहानी बनने की

    bahut hi sundar manoshi ...ek ek chhadika dil tak utar gayi ..hardik badhai

    जवाब देंहटाएं
  2. सभी क्षणिकाएं. बहुत हि खूबसूरत है ।।।

    जवाब देंहटाएं
  3. सभी क्षणिकाएं लाजवाब लगीं ।

    जवाब देंहटाएं
  4. बढ़िया!



    एक विनम्र अपील:

    कृपया किसी के प्रति कोई गलत धारणा न बनायें.

    शायद लेखक की कुछ मजबूरियाँ होंगी, उन्हें क्षमा करते हुए अपने आसपास इस वजह से उठ रहे विवादों को नजर अंदाज कर निस्वार्थ हिन्दी की सेवा करते रहें, यही समय की मांग है.

    हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार में आपका योगदान अनुकरणीय है, साधुवाद एवं अनेक शुभकामनाएँ.

    -समीर लाल ’समीर’

    जवाब देंहटाएं
  5. सभी क्षणिकाएं बहुत ही खूबसूरत हैं………………हर एक में भाव कूट कूट कर भरे हैं।

    जवाब देंहटाएं

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