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मंगलवार, 11 मई 2010

यह ह्रदय नहीं, एक निरा- मांस का पिंड है...(कविता)....आशुतोष ओझा जी


यह ह्रदय नहीं, एक
निरा- मांस का पिंड है
बड़ी निष्ठुर होकर
उसने मुझसे कहा होगा ,

गए बीत बरस
दो- चार मगर
तुम नहीं आये
तकती रही डगर
आखिर, कहाँ गए थे
किस शहर
भूली नहीं छोड़ दी , बिसरा दी
कब तक मरती
बिरह में तड़प-तड़प कर .
यह ह्रदय नहीं , एक
निरा-मांस का पिंड है


जेठ रहा या कातिक
क्या सावन, क्या भादों
साँस थे , एहसास थे , लेकिन
साथ नहीं थे , मरी नहीं
मार दी गयी , दिवस था
साप्ताहिक या कलमुंध पाक्छिक.

यह ह्रदय नहीं , एक
निरा-मांस का पिंड है........

8 टिप्‍पणियां:

  1. यह ह्रदय नहीं, एक
    निरा- मांस का पिंड है
    बड़ी निष्ठुर होकर
    उसने मुझसे कहा होगा ,

    आशुतोष जी , बहुत ही सुन्दर रचना ..कम शब्दो में शानदार अविभ्यक्ति .....बधाई

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  2. prem , virah ka sammishran li hui kavita bahut hi pashand aayi ...shuruaat bahut hi acchi lekin aant aur bhi accha ho sakta tha ..hardik badhai

    जवाब देंहटाएं
  3. गए बीत बरस
    दो- चार मगर
    तुम नहीं आये
    तकती रही डगर
    आखिर, कहाँ गए थे
    किस शहर
    भूली नहीं छोड़ दी , बिसरा दी
    कब तक मरती
    बिरह में तड़प-तड़प कर .
    यह ह्रदय नहीं , एक
    निरा-मांस का पिंड है


    aati sundar bhav iss rachna ke kuch line to dil tak utar gayi .. tahe dil se sukriya ashutosh ji aapko ..aur hindi sahitya manch ko

    जवाब देंहटाएं
  4. dil ko chhune wali rachan jab kisi nuojan ki padata huinu to achha lagata hai. sath me bhawana, jayotsan ke diye gulab ke fool kitabo me aaj bhi hamne jinda rakhe hain. mere liye wo yadeine hi dharohar hain. sayad apko bhi unki yadine vichalit karti hain. es rachana me wah pida bhi hai.
    Ratnakar mishra

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