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रविवार, 25 अप्रैल 2010

बहुत दिन हुए -- (कविता)..... कुमार विश्वबंधु

बहुत दिन हुए
कोई चिट्ठी नहीं आई
कोई मित्र नहीं आया दरवाजे पता पूछते
चिल्लाते नाम

बहुत दिन हुए
दाखिल नहीं हुई कोई नन्ही सी चिड़िया
तिनका-तिनका जोड़ा नहीं घर

खिड़कियों से होकर किसी सुबह
किसी शाम
उतरा नहीं आकाश
बहुत दिन हुए भूल गया
जाने क्या था उस लड़की का नाम !

बहुत दिन हुए
करता रहा चाकरी
गँवाता रहा उम्र
कमाता रहा रुपए

बहुत दिन हुए 
छोड़ दिया लड़ना

बहुत दिन हुए
भूल गया जीना।

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत दिन हुए
    छोड़ दिया लड़ना

    बहुत दिन हुए
    भूल गया जीना।



    शानदार रचना ..

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत दिन हुए
    करता रहा चाकरी
    गँवाता रहा उम्र
    कमाता रहा रुपए

    बहुत दिन हुए
    छोड़ दिया लड़ना

    बहुत दिन हुए
    भूल गया जीना।



    bahut hi acchi lagi aapki kavita ..

    जवाब देंहटाएं
  3. अच्‍छी कविता लगी किन्‍तु मुझे लगा कि इसको और अच्‍छा किया जा सकता था किन्‍तु मेरा मानना है कि कवि के भावो के अनुसार ही कव‍िता होनी चाहिये।

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत दिन हुए
    छोड़ दिया लड़ना

    बहुत दिन हुए
    भूल गया जीना।

    jeevan ke yatharth ka sundar chitran.

    जवाब देंहटाएं
  5. एकता कुमारी चौहान26 अप्रैल 2010 को 4:16 pm बजे

    अब क्या कहूँ, स‌बकुछ तो आपने कह ही दिया है। बधाई इस मन को झकझोड़नेवाली रचना के लिए.

    जवाब देंहटाएं

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