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शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

एक सपना जी रही हूँ......(कविता)......मनोशी जी


एक सपना जी रही हूँ






पारदर्शी काँच पर से
टूट-बिखरे झर रहे कण 
  विहँसता सा खिल रहा है
आँख चुँधियाता हर इक क्षण
  कुछ दिनों का जानकर सुख
मधु कलश सा पी रही हूँ

एक सपना जी रही हूँ

वह अपरिचित स्पर्श जिसने
छू लिया था मेरे मन को 
अनकही बातों ने फिर धीरे
से खोली थी गिरह जो
और तब से जैसे हाला
जाम भर कर पी रही हूँ
 
एक सपना जी रही हूँ

इक सितारा माथ पर जो
तुमने मेरे जड़ दिया था
और भँवरा बन के अधरों
से मेरे रस पी लिया था
उस समय के मदभरे पल
ज्यों नशे में जी रही हूँ

एक सपना जी रही हूँ

7 टिप्‍पणियां:

  1. इक सितारा माथ पर जो
    तुमने मेरे जड़ दिया था
    और भँवरा बन के अधरों
    से मेरे रस पी लिया था
    उस समय के मदभरे पल
    ज्यों नशे में जी रही हूँ

    एक सपना जी रही हूँ


    बहुत ही सुन्दर कविता ..उपर्युक्त पंक्तियों से प्रेम की प्रकास्था का सुन्दर चित्रण किया आपने ...

    जवाब देंहटाएं
  2. अनकही बातों ने फिर धीरे
    से खोली थी गिरह जो
    और तब से जैसे हाला
    जाम भर कर पी रही हूँ
    बहुत खूबसूरत

    जवाब देंहटाएं
  3. वह अपरिचित स्पर्श जिसने
    छू लिया था मेरे मन को
    अनकही बातों ने फिर धीरे
    से खोली थी गिरह जो
    और तब से जैसे हाला
    जाम भर कर पी रही हूँ

    एक सपना जी रही हूँ

    bahut sundar

    जवाब देंहटाएं

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