
एक सपना जी रही हूँ
पारदर्शी काँच पर से
टूट-बिखरे झर रहे कण
विहँसता सा खिल रहा है
आँख चुँधियाता हर इक क्षण
कुछ दिनों का जानकर सुख
मधु कलश सा पी रही हूँ
एक सपना जी रही हूँ
वह अपरिचित स्पर्श जिसने
छू लिया था मेरे मन को
अनकही बातों ने फिर धीरे
से खोली थी गिरह जो
और तब से जैसे हाला
जाम भर कर पी रही हूँ
एक सपना जी रही हूँ
इक सितारा माथ पर जो
तुमने मेरे जड़ दिया था
और भँवरा बन के अधरों
से मेरे रस पी लिया था
उस समय के मदभरे पल
ज्यों नशे में जी रही हूँ
एक सपना जी रही हूँ
इक सितारा माथ पर जो
जवाब देंहटाएंतुमने मेरे जड़ दिया था
और भँवरा बन के अधरों
से मेरे रस पी लिया था
उस समय के मदभरे पल
ज्यों नशे में जी रही हूँ
एक सपना जी रही हूँ
बहुत ही सुन्दर कविता ..उपर्युक्त पंक्तियों से प्रेम की प्रकास्था का सुन्दर चित्रण किया आपने ...
shaandar kvita padh kar hardik kushi hui ...dhanyavaad
जवाब देंहटाएंbehtarin rachna ....badhai aapko
जवाब देंहटाएंअनकही बातों ने फिर धीरे
जवाब देंहटाएंसे खोली थी गिरह जो
और तब से जैसे हाला
जाम भर कर पी रही हूँ
बहुत खूबसूरत
वह अपरिचित स्पर्श जिसने
जवाब देंहटाएंछू लिया था मेरे मन को
अनकही बातों ने फिर धीरे
से खोली थी गिरह जो
और तब से जैसे हाला
जाम भर कर पी रही हूँ
एक सपना जी रही हूँ
bahut sundar
bahut hi khubsurat bhaav liye yeh kavita achchhee lagi.
जवाब देंहटाएंप्रेम का सुन्दर चित्रण्।
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