गीत तुम्हारे मैंने गाये--------[अगीत]-------डाo श्याम गुप्त
गीत तुम्हारे मैंने गाये, अश्रु नयन में भर-भर आये, याद तुम्हारी घिर-घिर आई; गीत नहीं बन पाये मेरे। अब तो तेरी ही सरगम पर, मेरे गीत ढला करते हैं; मेरे ही रस,छंद,भाव सब , मुझसे ही हो गये पराये।
यह लयबद्ध अगीत आप् सब को पसन्द आया , सभी का धन्यवाद. सन्क्षिप्तता में अपनी पूरी बात कहदेना अगीत का प्रमुख गुण है, जो आदर्णीय निराला जी के अतुकान्त काव्य विधा को आगे बढाते हुए एक अन्य विधा है ।
sundar bhavavyakti.
जवाब देंहटाएंसुन्दर रचना ।
जवाब देंहटाएंगीत तुम्हारे मैंने गाये,
जवाब देंहटाएंअश्रु नयन में भर-भर आये,
बढ़िया लगी रचना गुप्ता जी ।
सुन्दर अगीत के लिए श्याम जी आभार आपका ।
जवाब देंहटाएंचन्द लफ्जो में बहुत कुछ कह दिया आपने श्याम जी , बधाई ।
जवाब देंहटाएंयह लयबद्ध अगीत आप् सब को पसन्द आया , सभी का धन्यवाद. सन्क्षिप्तता में अपनी पूरी बात कहदेना अगीत का प्रमुख गुण है, जो आदर्णीय निराला जी के अतुकान्त काव्य विधा को आगे बढाते हुए एक अन्य विधा है ।
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