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गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

"जीवन तो है क्षण भंगुर"-------[कविता]-------कुसुम ठाकुर

बिछड़ कर ही समझ आता, क्या है मोल साथी का ।

जब तक साथ रहे उसका, क्यों अनमोल न उसे समझें ।

अच्छाइयाँ अगर धर्म है, क्यों गल्तियों पर उठे उँगली ।

सराहने मे अहँ आड़े, अनिच्छा क्यों सुझाएँ हम ।

ज्यों अहँ को गहन न होने दें, तो परिलक्षित होवे क्यों ।

क्यों साथी के हर एक इच्छा, को मृदुल-इच्छा न समझे हम ।

सामंजस्य की कमी जो नहीं, कटुता का स्थान भी न हो ।

कहने को नेह बहुत, तो फ़िर क्यों न वारे हम ।

खुशियों को सहेजें तो, आपस का नेह अक्षुण क्यों न हो ।

दुःख भी तो रहे न सदा, आपस मे न बाटें क्यों ।

समर्पण को लगा लें गले, क्यों अधिकार न त्याजे हम ।

यह जीवन तो क्षण भंगुर, विषादों तले गँवाएँ क्यों ।।

11 टिप्‍पणियां:

  1. कुसुम जी इस सुन्दर कविता के लिए आभार ।

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  2. कुसुम ही सच ही कहा आपने , दर्द का पता तो तब ही चल पाता जब कोई अपना हमसे जुदा होता है । रचना बहुत अच्छी लगी , बधाई

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  3. "बिछड़ कर ही समझ आता,क्या है मोल साथी का।
    जब तक साथ रहे उसका,क्यों अनमोल न उसे समझें।
    सुंदर रचना के माध्यम से सच्चा सन्देश

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  4. "क्यों साथी के हर एक इच्छा, को मृदुल-इच्छा न समझे हम।"

    बहुत सुन्दर! यही होना चाहिये!!

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  5. आपकी रचना के भाव एक गजल के इस शेर से बहुत मिलते हैं

    "दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
    मिल जाये तो माटी है...खो जाये तो सोना है"

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  6. विछोह की पिड़ा क्या होती है ये उसके बाद ही पता चलता है । सुन्दर कविता

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  7. ज्यों अहँ को गहन न होने दें, तो परिलक्षित होवे क्यों ।
    क्यों साथी के हर एक इच्छा, को मृदुल-इच्छा न समझे हम ।

    कुसुम जी आपकी ये लाईंन बहुत कुछ बयाँ कर रही है ,सुन्दर शब्दो के साथ बढियां कविता लगी , बधाई स्वींकार करें ।

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  8. kusum ji sach kaha aapna...atyant sunder abhivyakti...jo sach se ru-b-ru karati hai.

    Anamika7577.blogspot.com

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