आज कल जो भी दिखता है परेशान दिखता है,
वक्त ऐसा है बस इंसान ही नहीं दिखता है।
जहां देखो बस ऐतबार नहीं दिखता है,
इंसान कहता है बस प्यार नहीं मिलता है।
मालिक को मजदूर दिखता है, मजबूरी नहीं,
मजदूर को परिवार दिखता है पर प्यार नहीं मिलता है।
गांवों से लेकर शहरों तक इंकार ही दिखता है,
इकरार चाहिए तो वही अपना परिवार दिखता है।
जहां देखता हूं बस हर इंसान बेकरार दिखता है,
अकसर हर आदमी बस यही कहता है कि सब कुछ बिकता है।
बिल्कुल सही बात लिखी है आपने कविता में । आज ऐसा ही है इंसान ।
जवाब देंहटाएंआज कल जो भी दिखता है परेशान दिखता है,
जवाब देंहटाएंवक्त ऐसा है बस इंसान ही नहीं दिखता है।
-बहुत बेहतरीन, वाह!!
जहाँ देखो परेशान बेहाल इंसान ...मगर यही जीने का हसला भी देते हैं ...
जवाब देंहटाएंऔरो का ग़म देखा तो अपना भूल गए ....!!
वाकई सच यही है आज के इंसान का ।
जवाब देंहटाएंहिन्दी साहित्य मंच पर आपका स्वागत है । इंसानी जिंदगी पर आपकी रचना पसंद आयी ।
जवाब देंहटाएंजहां देखता हूं बस हर इंसान बेकरार दिखता है,
जवाब देंहटाएंअकसर हर आदमी बस यही कहता है कि सब कुछ बिकता है।
भई वाह बहुत खूब ।