प्रस्तुति मिथिलेश दुबे
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गुरुवार, 3 सितंबर 2009
हिन्दी साहित्य मैं न पढ़ूगा ????? बोलो
हिन्दी साहित्य से लोगों की अरुचि दिनों दिन तेजी से बढ़ती जा रही है। बच्चों को आज साहित्य से वंचित रहना पङता है और कमोवेश जो शिक्षा के माध्यम से दिया जाता है वह ना काफी है। जब कोई युवा पीढी का नागरिक यह पूछता है" कि मैथिलीशरण गुप्त या सुमित्रा नंदन पंत कौन हैं? तो इन राष्ट्रकवियों पर एक सवालिया निशान सा लगता है । कहीं न कहीं साहित्य में महान कवियों को आज भुलाया जा रहा है । जो अपेक्षा आज मीडिया , सरकार व पढ़े लिखे वयक्ति से की जाती है वह उस पर खरे नहीं उतरते हैं । थोड़ा पीछे की बात की जा तो कमलेश्वर जी का निधन हुआ था । देश ने महान साहित्यकार, आलोचक खो दिया था । अलगी सुबह समाचार-पत्र में एक छोटे कालम में समाचार ऐसे प्रकाशित होता है जैसे- गुमशुदगी का विज्ञापन हो । हमारा मीडिया कहीं न कहीं बाजारवाद का शिकार है। वही खबरें दिखाई जाती है जो टीआरपी बढ़ाये । जैसे- राखी सावंत या शिल्पा शेट्टी का चुबंन प्रकरण । वर्ष 2007 में हिन्दी साहित्य के तीन दिग्गज साहित्यकार हरिवंश राय बच्चन , आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ठर महादेवी वर्मा जी के जन्म के १०० वर्ष पूरे हुए थे । इन तीनों का भव्य और दिव्य शताब्दी वर्ष जितना अपेक्षित रहा उतना ही उपेक्षित रहा । ऐसे में राष्ट्रभाषा के बचाव हेतु हम सभी को कम से कम ऐसे कवियों , साहित्यकारों की उपेक्षा करना किसी भी तरह से सही नहीं है । अभी आने वाले 14 सितंबर को हम सभी हिन्दी दिवस के रूप में मनाते हैं परन्तु बाजार इसके लिए उत्साहित न होगा । वह तो वेलेन्टाइन डे जैसे पर्व का इतंजार करता है । जिसमें लाभ हो सके । अन्ततः एक दिवस मात्र से या एक सम्मेलन या एक कालम ही हिन्दी साहित्य को न समेट सकेगा । एक प्रयास स्वयं से करें हिन्दी साहित्य हेतु ।
हिन्दी पखवाड़े में आज का व्यक्तित्व " फादर कामिल बुल्के "
हिन्दी पखवाड़े को ध्यान में रखते हुए हिन्दी साहित्य मंच नें 14 सितंबर तक साहित्य से जुड़े हुए लोगों के महान व्यक्तियों के बारे में एक श्रृंखला की शुरूआत की है । जिसमें भारत और विदेश में महान लोगों के जीवन पर एक आलेख प्रस्तुत किया जायेगा । आज की पहली कड़ी में हम " फादर कामिल बुल्के " के बारे में जानकारी दे रहें । उम्मीद है कि आपको हमारा प्रयास पसंद आयेगा ।
"लौट आये वो"
वक्त बीतता गया उन लम्हों के साथ,
जिसमें थी मेरी तन्हाई,
अन सुलझे हुए मुद्दों पर
आज नहीं होती है लडाई,
सोचता था ,
चाहता था,
जो कुछ भी मैं,
वो सब कुछ मिल गया,
पर
अब भी कसक उठती जहन में,
किस बात से थी रूसवाई,
सब बदला नहीं आज भी,
जो साथ हम आज भी,
बुनता हूँ यादों का ताना बाना
कुछ अकेले में,
वो प्यार या थी बेवफाई,
कभी-कभी रो लेता मैं चुप होकर
आंसू जिसे मोती कहती थी वो,
अब आते नहीं क्यों ?
मालूम नहीं ,
जो कुछ हुआ अच्छा हुआ,
हम साथ अब,
शायद यह थी-
प्यार की आजमाइश,
कहना भी डर डर के,
हर लफ्ज को,
फिर से न आये ये ,
रूसवाई।,
प्रस्तुत कर्ता
(नीशू)