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शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

वो नज़रों से मेरी नज़र काटता है ---------(जतिन्दर परवाज़)

वो नज़रों से मेरी नज़र काटता है


मुहब्बत का पहला असर काटता है


मुझे घर में भी चैन पड़ता नही था


सफ़र में हूँ अब तो सफर काटता है


ये माँ की दुआएं हिफाज़त करेंगी


ये ताबीज़ सब की नज़र काटता है


तुम्हारी जफ़ा पर मैं ग़ज़लें कहूँगा


सुना है हुनर को हुनर काटता है


ये फिरका-परसती ये नफरत की आंधी


पड़ोसी, पड़ोसी का सर काटता है


5 टिप्‍पणियां:

  1. रचना छोटी परन्तु बहुत कुछ बयाँ करती हुई। बहुत बढ़िया........

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  2. नजरों से नजरों का ..हुनर से हुनर का काटना बहुत बढ़िया ..!!

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  3. ये फिरका-परसती ये नफरत की आंधी
    पड़ोसी, पड़ोसी का सर काटता है

    जतिन्दर अपनी शायरी से किसी को भी दीवाना बना सकते हैं...सबूत के तौर पर उनकी ये ग़ज़ल पेश की जा सकती है...हर शेर कमाल का है...खुदा से दुआ है वो इसी तरह लगातार लिखते रहें...
    नीरज

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  4. सुना है हुनर को हुनर काटता है
    ये फिरका-परसती ये नफरत की आंधी
    पड़ोसी, पड़ोसी का सर काटता है

    aajkal yahi sub dekhkar man dukhi hota hai ....
    Badhai

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  5. सुंदर रचना जो समाज की स्थिति को दर्शाती है.

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