हवाओं में प्यार की खुशबू,
बिखरी हुई है ,
फिजाएं भी महकी,
हुई है,
खामोश रातें रौशन ,
हुई हैं,
चांदनी भी चंचल ,
हुई है ,
बूदें जैसे मोती,
हुई हैं,
सूरज की किरणें चमकीली
हुई हैं,
बागों की कलियां खिल सी ,
गयी हैं,
अम्बर से घटाएं ,
बहने लगी हैं,
मिट्टी की खुशबू,
फैली हुई हैं, चारो तरफ
जैसे इन सब को पता है कि-
तुम आ चुकी हो,
वापस आ चुकी हो।।
खूबसूरत कविता....
जवाब देंहटाएंबेहद सुन्दर अभिव्यक्ति । बधाई
जवाब देंहटाएंअज़ीज के वापसी की बधाई
जवाब देंहटाएंआपके चेहरे के रौनक ने बयाँ कर दिया होगा.
बहुत खूबसूरत कविता है बधाई
जवाब देंहटाएंachchi kavita hai.
जवाब देंहटाएंachchi kavita hai.
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंसुन्दर.. पर कौन आ गयी है :)
जवाब देंहटाएंआभार
प्रतीक माहेश्वरी
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