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मंगलवार, 10 नवंबर 2009

आज की कविता-----------(किशोर कुमार खोरेन्द्र)

तुम बनी रहना
चिर वियोग का क्षितिज
चलता रहूँगा
राह सा
मै अंतहीन
ठहरूंगा नही किंचित
आजीवन
तुम्हें पाने के लीये
मै
बन एक पथिक


दर्दो कों शुलो सा सह जाऊँगा
जहर कों मधु -बूंदों सा पी जाउंगा
यादो के तेरे पाक सुमनों कों
चढा
हर मन्दिर
सीढियों से उतर
फ़ीर जीता रहूँगा बन
एक गर्दिश


तुम यथार्थ और स्वप्न भी
तुम अन्नत दूरी
और हो
मेरे बहुत समीप
तुम खुश्बू मेरी
मै
चन्दन सा वृक्ष


बाहुपाश मे तुम्हारे
होने समाहित
मै भट्कुंगा-जन्मो तक
जान यह कि -
तुम्हें पाना है असंभव
और कठिन

16 टिप्‍पणियां:

  1. किशोर जी बहुत बढ़िया रचना प्रस्तुत की है आपने। आभार ..............

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  2. किशोर जी लाजवाब प्रस्तुति। बधाई

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है किशोर जी को बधाई

    जवाब देंहटाएं
  4. सुन्दर रचना शुक्रिया इस को पढ़वाने के लिए

    जवाब देंहटाएं
  5. रंजना [रंजू भाटिया]

    ji.prashansa ke liye dhnyvaad

    जवाब देंहटाएं
  6. तुम बनी रहना
    चिर वियोग का क्षितिज
    चलता रहूँगा

    laajwaab

    जवाब देंहटाएं

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