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रविवार, 4 अक्टूबर 2009

बारिशों में नहाना भूल गए-------------(जतिन्दर परवाज़ )

बारिशों में नहाना भूल गए


तुम भी क्या वो जमाना भूल गए


कम्प्यूटर किताबें याद रहीं


तितलियों का ठिकाना भूल गए


फल तो आते नहीं थे पेडों पर


अब तो पंछी भी आना भूल गए


यूँ उसे याद कर के रोते हैं


जेसे कोई ख़जाना भूल गए


मैं तो बचपन से ही हूँ संजीदा


तुम भी अब मुस्कराना भूल गये

7 टिप्‍पणियां:

  1. कम्प्यूटर किताबें याद रहीं
    तितलियों का ठिकाना भूल गए

    फल तो आते नहीं थे पेडों पर
    अब तो पंछी भी आना भूल गए

    बेहतरीन.

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  2. क्या बात है । बहुत ही सुन्दर रचना । बधाई

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  3. आप की इस ग़ज़ल में विचार, अभिव्यक्ति शैली-शिल्प और संप्रेषण के अनेक नूतन क्षितिज उद्घाटित हो रहे हैं।

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