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रविवार, 27 सितंबर 2009

परमार्थ--------"डा. श्याम गुप्त"

प्रीति मिले सुख-रीति मिले,


धन-प्रीति मिले, सब माया अजानी।



कर्म की, धर्म की ,


भक्ति की सिद्धि-प्रसिद्धि मिले सब नीति सुजानी ।



ग्यान की कर्म की अर्थ की रीति,


प्रतीति सरस्वति-लक्ष्मी की जानी ।


रिद्धि मिली,सब सिद्धि मिलीं,


बहु भांति मिली निधि वेद बखानी



सब आनन्द प्रतीति मिली,


जग प्रीति मिली बहु भांति सुहानी


जीवन गति सुफ़ल सुगीत बनी,


मन जानी, जग ने पहचानी



जब सिद्धि नहीं परमार्थ बने,


नर सिद्धि-मगन अपने सुख भारी ।


वे सिद्धि-प्रसिद्धि हैं माया-भरम,


नहिं शान्ति मिले,हैंविविध दुखकारी।


धन-पद का, ग्यान व धर्म का दम्भ,


रहे मन निज़ सुख ही बलिहारी।


रहे मुक्ति के लक्ष्य से दूर वो नर,


पाठ-भ्रष्ट बने वह आत्म सुखारी ।



यह मुक्ति ही नर-जीवन का है लक्ष्य,


रहे मन,चित्त आनंद बिहारी ।



परमार्थ के बिन नहिं मोक्ष मिले,


नहिं परमानंद न क्रष्ण मुरारी ।।



जो परमार्थ के भाव सहित,


निज़ सिद्धि को जग के हेतु लगावें ।



धर्म की रीति और भक्ति की प्रीति,


भरे मन कर्म के भाव सजावें ।


तजि सिद्धि-प्रसिद्धि बढें आगे,


मन मुक्ति के पथ की ओर बढावें ।


योगी हैं, परमानंद मिले,


परब्रह्म मिले, वे परम-पद पावें


चारि पदारथ पायं वही,


निज़ जीवन लक्ष्य सफ़ल करि जावें


भव-मुक्ति यही, अमरत्व यही,


ब्रह्मत्व यही, शुचि वेद बतावें



6 टिप्‍पणियां:

  1. डाo श्याम जी , छंद सवैया पढ़कर मन आनंदित हो गया । बहुत ही सशक्त रूप से लेखन किया है आपने । शब्द भी प्रभावशाली है । बधाई

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  2. लाजवाब । बहुत ही सुन्दर , प्रभावपूर्ण , सशक्त लेखन ।

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  3. बहुत ही सुन्दर रचना। श्याम जी का बहुत-बहुत आभार........

    जवाब देंहटाएं
  4. मेरा स्वरचित नया छंद ’श्याम सवैया ” पसन्द करने व उत्साह वर्धन के लिये सभी का आभार ।

    जवाब देंहटाएं
  5. हिंदी साहित्य मंच----
    इसे पूरी पन्क्तिको एक लाइन में लिखा जाना चाहिये--यथा-
    "प्रीति मिले सुख .... ,सब माया अजानी।
    कर्म की,धर्म की,भक्ति....सब नीति सुजानी।
    ग्यान की.........................।
    रिद्दिे मिली........................।
    सब आनंद........................।
    जीवन गति...................पहचानी।"
    ------इसी तरह..।

    जवाब देंहटाएं

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