जिन्दगी कोई छोटी चुनौती नहीं
हार से डर समरभूमि मत छोड़ना
है सफलता किसी की बपौती नहीं ।
माथ धुनते बिलखते ऋणी रिक्तकर
एक हारे जुआरी-सा जाओगे क्या ?
थपथपा प्यार से पीठ मुख चूमकर
जिसने भेजा उसे मुख दिखाओगे क्या?
जग में जी लेना कीड़े मकोड़े सा तुम
माँ ने मानी थी ऐसी मनौती नहीं ।
श्वान के पूँछ सी यह भी क्या जिन्दगी
कर सकी जो सरलता को धारण नहीं
गुह्य गोपन में सक्षम नहीं, कर सकी
जो मशकदंश का भी निवारण नहीं,
ईश पद धो स्वयं भी निखर जाय क्यों
करता मन केंवटा की कठौती नहीं ।
दिन गये सो गये तूँ है जब से जगा
बस उसी क्षण से अपनी सुबह मान ले
कोख माता की लज्जित करेगा नहीं
बावरे आज ही ऐसा प्रण ठान ले ,
आखिरी साँस तक धैर्य मत छोड़ना
कवि की आती कभी भी बुढ़ौती नहीं ।
bahut hI sundar rchna
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