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गुरुवार, 21 मई 2009

रिश्ते की ताजगी न रही............................तुममें वो सादगी न रही,

रिश्ते की ताजगी,
न रही,
तुममें वो सादगी,
न रही,
कहती हो प्यार,
मुझसे है,
पर
ये बातें सच्ची न लगी,
तुम कहती थी,
तो
मैं सुनता था,
तुम रूठती थी,
तो
मै मनाता था,
तुम चिढ़ती थी,
तो
मैं चिढ़ाता था,
तुम जीतती थी,
तो
मैं हार जाता था,
ये सब अच्छा लगता था,
मुझे
वक्त ने करवट ली,
मैं भी हूँ,
तुम भी हो,
साथ ही साथ हैंं,
पर
वो प्यार न रहा,
वो बातें न रही,
तुम कहती हो कि-
मैं बदल गया,
शायद हां- मैं ही बदल गया।
क्योंकि
तुम्हारा जीतना,
तुम्हारा हसना,
तुम्हारा मुस्कुराना,
अच्छा लगता है अब भी,
चाहे मुझे हारना ही क्यों न पड़े ।।

8 टिप्‍पणियां:

  1. neeshooji bahut badiya likhte hain aap kitane kareene se har jit ka arth bata dia
    jeet uski nahin jisne kisi ko thhukraya jeeta vo jisne har kar bhi na iman giraayaa
    abhar hindi me likhne ke liye mujhe pehle comp band karna padega hindi cafe likh nahin raha is liye hindi manch par roman me likh rahi hoon sorry

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  2. निर्मला जी । आपका बहुत धन्यवाद । धीरे धीरे सही हो जायेगा ।

    जवाब देंहटाएं
  3. नीशू जी , बहुत ही अच्छी लगी आपकी ये कविता हार में भी जीतना अच्छा लगा । मर्मस्पर्शी रचना दिल के करीब लगी । शुक्रिया

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  4. दोस्त , जिस तरह से आपने कविता के द्वारा अपने प्यार के खेल को दिखाया है वह काबिले तारीफ है । बहुत ही सरल शब्दों में आपने अपनी बात कह दी । प्रशंसनीय कविता के लिए धन्यवाद

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  5. नीशू जी , बहुत खूब । आपने अपने हार को भी जीत में बदल दिया । कविता बहुत ही सरल लगी , शब्द सरल और भाव बहुत ही प्रगाढ़ लगे । आपका तहे दिल से शुक्रिया इस रचना हेतु । शुभकामनाएं

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  6. bahut hi sundar kavita , prem ki abhivyakti se bharpoor..

    ek suggestion hai boss. wo comment post karne waali line ka colour change kar dijiyenga .... yellow colour red me mix ho gaya hai ..

    meri dil se badhai sweekar kariyenga

    vijay
    www.poemsofvijay.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं

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