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गुरुवार, 28 मई 2009

मेरी दीवानगी [ गज़ल ] - मुस्तकीम खान


नाम- मुस्तकीम खान
शिक्षा-स्नातक( बी.काम) , परास्नातक ( मास्टर आफ आर्ट एण्ड मास कम्युनिकेशन ) , माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय , नोएडा कैंपस,
जन्म- २९ मार्च १९८८ , आगरा , उत्तर प्रदेश ।
रूचि- गज़ल, गीत लेखन ,गायन ।
संपर्क- मुस्तफा क्वाटर्स , आगरा कैंट, आगरा ।
मो- ०९९९०८४०३३९ .




मेरी दीवानगी




मुझको किसी से नफरत नहीं है ,
इतना आवार हूँ कि फुर्सत नहीं है ।
प्यार की कुर्बानी गिना रहे हो,,
कहते क्यूँ नहीं कि हिम्मत नहीं है ।।

हुस्न के बाजार मे दिल का ये हाल है,
हीरा है फिर भी कोई कीमत नहीं है।
छुपाती हैं आँखें कई गम अपने अंदर,,
खुशी किसी चेहरे की हकीकत नहीं है।

कह तो दिया तुम दोस्त हो अच्छे,
वो और कैसे कहें कि मोहब्बत नहीं है ।

7 टिप्‍पणियां:

  1. मुस्तकीम जी , आपकी ये गजल बहुत ही बेहतरीन लगी ।

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  2. आपकी ये गजल सुन्दर लगी ।

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  3. वाह वाह , क्या बात है भाई जी । शुक्रिया इस गजल के लिए ।

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  4. छुपाती हैं आँखें कई गम अपने अंदर,,
    खुशी किसी चेहरे की हकीकत नहीं है।

    कह तो दिया तुम दोस्त हो अच्छे,
    वो और कैसे कहें कि मोहब्बत नहीं है.

    ये लाइनें बहुत ही अच्छी लगी । बधाई

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  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  6. मुस्तकीम जी , आपका हिन्दी साहित्य मंच पर बहुत बहुत स्वागत है । आपकी दीवानगी गजल अतिसुन्दर है । सच को पेश किया है आपने ।

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