लोग अक्सर मुझपे फिकरे कसते हैं
पडा रहता है टूटी खाट मैं
बुन क्यों नही लेता इसे फिर से
कैसे कहूँ क्यों नही बुन लेता ?
सोचता हूँ तो हाथ कांपने लगते है
ये खाट और रिश्ते मुझे एक से लगते हैं !
मैंने अपने हर नए रिश्ते की तरह
कितने शौक से बुना था हर ताना
कितने सुंदर लगते थे नए-नए !
जिंदगी में हर रिश्ता इस ताने जैसा ही हो गया
दोनों का न जाने कौन सा ताना कब टूट गया
साथ-साथ रहते हुए भी मुझे पता ना चला
धीरे-धीरे एक-एक कर सारे ताने टूट गए !
रह गए कुछ टूटे रिश्ते और टूटे हुए ख्वाब
टूटी हुई खाट के टूटे हुए तानों की तरह !
उलझ गया हूँ इन टूटे हुए रिस्तो में
मैं अब फिर से नही बुनना चाहता
ना किसी रिश्ते को ना ही इस टूटी खाट को !!
निर्झर जी , आपका इस मंच पर बहुत बहुत स्वागत है ।
जवाब देंहटाएंरिश्ते पर सुंदर कविता ।
जवाब देंहटाएंहिंदी साहित्य मंच का आभारी हूँ जिसने मेरे भावों को प्रकाशित किया .
जवाब देंहटाएंMithilesh Dubey ji
आपने सराहा ये खुशनसीबी है मेरी
निर्झर जी , आपकी यह कविता बहुत ही प्रभावशाली है । हमारे रिश्ते कुछ ऐसे ही होते हैं । बधाई
जवाब देंहटाएंsunder kavita
जवाब देंहटाएंsunder kavita lagi aapki
जवाब देंहटाएं