Pages - Menu
बुधवार, 29 अप्रैल 2009
कविता - व्यंग्य
राजनीति के भंवर मे सब नेता बन गये हैं
इस देश के निर्माता अभिनेता बन गये हैं
महिलाओं की आज़ादी के भाषण कूटते हैं
चौरास्ते पर उनकी इज्जत लूटते हैं
गरीबों की भलाई के लिये क्या नही करते
उनके नाम की ग्रांट से अपनी जेबें भरते
भ्रष्टाचार खत्म करने की कसमे खाते हैं
बेईमानी की गंगा मे दिन रात नहाते हैं
जो सच्चा इनसान हो उससे तो कतरातेहैं
वो काम कराने जाये तो उसे डराते है
काम कराना हो इनसे तो नेतगिरी दिखलाओ
विपक्षी की निन्दा करो इस नेता के गुण गाओ
सोमवार, 27 अप्रैल 2009
गजल
लोग विरासत का खज़ाना भूल गये
रिश्तों के पतझड मे ऐसे बिखरे
लोग बसंतों का जमाना भूल गये
दौलत की अँधी दौड मे लोग
मानवता निभाना भूल गये
भूल गये गरिमा आज़ादी की
शहीदों का कर्ज़ चुकाना भूल गये
जो धर्म के ठेकेदार बने
खुद धर्म निभाना भूल गये
पत्नी की आँ चल मे ऐसे उलझे
माँ का पता ठिकाना भूल गये
परयावरण पर भाशण देते
पर पेड लगाना भूल गये
भूल गये सब प्यार का मतलव
लोग हंसना हसाना भूल गये
शनिवार, 25 अप्रैल 2009
माँ की पुकार
बेटी जब से ससुराल गयी है
मेरी सुध ना किसी ने जानी ह
दिल मै उसकी यादें हैं
और आँखों मे पानी है
सुनसान है घर का कोना कोना
जहाँ गूंजते थे उसके कहकहे
ना घर की रोनक वही रही
ना दिवरों के रंग ही वो रहे
पापा तेरे इक कोने मे
चुपचाप से बैठे रहते हैं
याद तुझे कर कर के बेटी
उनकी आँख से आँसू बहते हैं
समाज बनाने वलों ने
ये कैसी रीत बनाई है
माँ के जिगर के टुकडों की
दुनिया दूर बसाई है
दिल करता है तुझे बुलाऊँ
पर तेरी भी है मजबूरी
पर तेरे बिन प्यारी बेटी
तेरी माँ है बडी अधूरी
जब भी घर के पिछवडे से
गाडी की सीटी सुनती हूँ
इक झूठी सी आशा मे बेटी
तेरे पाँव की आहट सुनती हूँ
आओ जीते जी कुछ बातें कर लो
फिर कौन तुझे बुलायेगा
आज इस घर मे मै रोती हूँ
फिर ये घर तुझे रुलायेगा
माँ बेटी के रिश्ते की
दर्द भरी कहानी है
माँ बिना फिर कैसा मायका
सब रिश्ते बेमानी हैं
शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009
नदी की तरह से
नदी की तरह
बहते रहे तो
सागर से मिलेंगे,
थम कर रहे तो
जलाशय बनेंगे,
हो सकता है कि
आबो-हवा का
लेकर साथ,
खिले किसी दिन
जलाशय में कमल,
हो जायेगा
जलाशय का रूप
सुहावन, विमल,
पर कब तक?
गर्म तपती धूप जैसे
हालातों से
उड़ जायेगी
कमल की
गुलाबी रंगत,
वीरान हो जायेगा
तब फिर
जलाशय,
मगर.....
नदिया बह रही है,
बहती रहेगी,
हरा-भरा
करती रहेगी
और एकाकार हो जायेगी
सागर के संग।
लब्ध प्रतिष्ठित कवि मदन ‘विरक्त’

बुधवार, 22 अप्रैल 2009
नया जीवन

सोमवार, 20 अप्रैल 2009
माँ की फरियाद.
अपनी फरियाद सुनाने आई हूं,मैं तुम्हें जगाने आई हूं,
जब देशभक्त परवानों ने आजादी के दिवानों ने,
दुशमन से मुझे छुडाया था तो अपना लहू बहाया था,
मुझे अपने बेटों को समर्पित कर वो चले गये,
कुछ ही वर्शों में मेरे बेटे भी बदल गये,
देश को बोटी बोटी कर खा रहे हैं, मुझे पतिता बना रहे हैं,
अपना हाल सुनाने आई हूं, मै तुम्हें जगाने आई हूं
बडे बडे नेता अधिकारी बन गये हैं,
सिर से पाँव तक भृ्श्टाचार में सन गये हैं,
संविधान की धज्जियां उडा रहे हैं,
स्वयं हित भाई से भाई लडा रहे हैं,
वीरों की कुर्वानी भूल गये हैं,
आदर्श इतिहास सब धूल गये हैं,
इनके घोटालों का बसता भारी है,
कोने कोने मे शड्यंन्त्रकारी है,
देश की ताजा तस्वीर दिखाने आई हूँ, मैं तुम्हें ज्गाने आई हूँ.
बच्चो ये भारत देश तुम्हारा है,
इस पर अब हक तुम्हारा है,
तुम्हारे अविभावक कर देंगे इसे निलाम,
तुम फिर से बन जाओगे गुलाम,
अपनी संस्कृ्ति को तुम पेह्चान लो,
अपने कर्तव्य को भी जान लो,
इन भृ्श्टाचारियों से देश बचाओ,
प्यार से ना माने तो अर्जुन बन जाओ,
तुम्हे़ खबर्दार बनाने आई हूं, मैं तुम्हें जगाने आई हूँ
शनिवार, 18 अप्रैल 2009
राजीव थेप्रा की कलम से-
............दोस्तों एक कलमकार का अपनी कलम छोड़ कर किसी भी तरह का दूसरा हथियार थामना बस इस बात का परिचायक है कि अब पीडा बहुत गहराती जा रही है और उसे मिटाने के तमाम उपाय ख़त्म....हम करें तो क्या करें...हम लिख रहें हैं....लिखते ही जा रहे हैं....और उससे कुछ बदलता हुआ सा नहीं दिखाई पड़ता....और तब भी हमें कोई फर्क नहीं पड़ता तो हमारी संवेदना में अवश्य ही कहीं कोई कमी है... मगर जिसे वाकई दर्द हो रहा है....और कलम वाकई कुछ नहीं कर पा रही....तो उसे धिक्कारना तो और भी बड़ा पाप है....दोस्तों जिसके गम में हम शरीक नहीं हो सकते....और जिसके गम को हम समझना भी नहीं चाहते तो हमारी समझ पर मुझे वाकई हैरानी हो रही है....जूता तो क्या कोई बन्दूक भी उठा सकता है.....बस कलेजे में दम हो.....हमारे-आपके कलेजे में तो वो है नहीं....जिसके कलेजे में है.....उसे लताड़ना कहीं हमारी हीन भावना ही तो नहीं...........??????
.............दोस्तों हमारे आस-पास रोज-ब-रोज ऐसी-ऐसी बातें हो रही हैं और होती ही जा रही हैं,जिन्हें नज़रंदाज़ कर बार-बार हम अपने ही पैरों में कुल्हाडी मारते जा रहे हैं....और यह सब वो लोग अंजाम दे रहे हैं, जिन्हें अपने लिए हम अपना नुमाइंदा "नियुक्त" करते हैं....!!यह नुमाइंदा हमारे द्वारा नियुक्त होते ही सबसे पहला जो काम करता है,वो काम है हमारी अवहेलना....हमारा अपमान....हमारा शोषण....और हमारे प्रत्येक हित की उपेक्षा.....!!.........दोस्तों यहाँ तक भी हो तो ठीक है.....लेकिन यह वर्ग आज इतना धन-पिपासू....यौन-पिपासू.... जमीन-जायदाद-पिपासू.....इतना अहंकारी और गलीच हो चुका है कि अपने इन तीन सूत्री कार्यक्रम के लिए हर मिनट ये देश के साथ द्रोह तक कर डालता है....देश के हितों का सौदा कर डालता है....यह स्थिति दरअसल इतने खतरनाक स्तर तक पहुँच चुकी है कि इस वर्ग को अब किसी का भय ही नहीं रह गया है....पैसे और ताकत के मद में चूर यह वर्ग अब अपने आगे देश को भी बौना बनाए रखता है.....निजी क्षेत्र के किए गए कार्यों की भी यह ऐसी की तैसी किए दे रहा है.....निजी क्षेत्र ने इस देश की तरक्की में जो अमूल्य योगदान सिर्फ़ अपनी मेहनत-हुनर और अनुशासन के बूते दिया है.....यह स्वयम्भू वर्ग उसके श्रेय को भी ख़ुद ही बटोर लेना चाहता है....और यहाँ तक कि यह वर्ग अपने पद और रसूख के बूते उनका भी शोसन कर लेता है.....यानी कि इसकी दोहरी मार से कोई भी बचा हुआ नहीं है......!!
यह स्थिति वर्षों से जारी है...और ना सिर्फ़ जारी है....बल्कि आज तो यह घाव एक बहुत बड़ा नासूर बन चुका है...अब इसे अनदेखा करना हमारे और आप सबके लिए इतनी घातक है कि इसकी कल्पना तक आप नहीं कर सकते........आन्दोलन तो खैर आने वाले समय में होगा ही किंतु इस समय इस लोकतंत्र का महापर्व चल रहा है.....इस महापर्व का अवसान फिजूल में ही ना हो जाए....या कि यह एक प्रहसन ही ना बन जाए.....इसके लिए सबसे पहले हम जैसे पढ़े-लिखे लोगों को ही पहल करनी होगी.....क्योंकि मैं जानता हूँ कि सभ्य-सुसंस्कृत और पढ़े-लिखे माने जाने वाले सो कॉल्ड बड़े लोगों में अधिकाँश लोग अपने मत का प्रयोग तक नहीं करते....लम्बी लाईनों में लगना....धूप में सिकना....गंदे-संदे लोगों के साथ-साथ खड़े होना......घर की महिलाओं को इस गन्दी भीड़ का हिस्सा होते हुए ना देख पाना.....या किसी काल्पनिक हिंसा की आड़ लेकर चुनाव से बचना हमारा शगल है....!!
मज़ा यह कि हम ही सबसे वाचाल वर्ग भी हैं.....जो समाज में सबसे ज्यादा हल्ला तरह-तरह के मंचों से मचाते रहते हैं.....कम-से-कम अपने एक मत (वोट)का प्रयोग कर ख़ुद को इस निंदा-पुराण का वाजिब हक़ दिला सकते हैं....वरना तो हमें राजनीति की आलोचना करने का भी कोई हक़ नहीं हैं......
अगर वाकई मेरी बात सब लोगों तक पहुँच रही हो....तो इस अनाम से नागरिक की देश के समस्त लोगों से अपील है.....बल्कि प्रार्थना हैं कि इस चुनाव का वाजिब हिस्सा बनकर.....और कर्मठ लोगों को जीता कर हमारी संसद और विधान-सभाओं में पहुंचाएं.....और आगे से हम यह भी तय करें कि यह उम्मीदवार जीतने के पश्चात हमारे ही क्लच में रहे.....हमारे ही एक्सीलेटर बढ़ाने चले.......!!
................दोस्तों बहुत हो चुका....बल्कि बहुत ज्यादा ही हो चुका......अब भी अगर यही होता दीखता है तो फिर तमाम लोग सड़क पर आने को तैयार हो जाए.....अब तमाम "गंदे-संदे.....मवालियों....देश के हितों का सौदा करने वालों.....जनता की अवहेलना करने वालों.....और इस तरह की तमाम हरकतें करने वालों को...............।
शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009
गज़ल
जब से मै और तुम हम न रहे
तब से दोस्ती मे वो दम ना रह
जीते रहे ज़िन्दगी को जाना नहीं
टेढे थे रस्ते, जमे कदम ना रहे
तकरार से फासले नहीं मिटते
जब भी शिकवे हुये हम हम ना रहे
रातें सहम गयी दिन बहक गये हैं
पलकें सूनी हैं आँसू भी नम ना रहे
फिरते हैं सजा के होठों पे हंसी
तन्हाई मे अश्क भी कम ना रहे
इक जिस्म दो जान हुआ करते थे
वो दोस्त अब हमदम ना रहे
गुरुवार, 16 अप्रैल 2009
कृष्ण कुमार यादव कृत काव्य संग्रह ‘अभिलाषा’ पर समीक्षा गोष्ठी
वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेन्द्र वर्मा ने कहा कि संग्रह की प्रत्येक कविता संदेशप्रद और कवि की आध्यात्मिक चेतना का प्रतिबिम्ब दिखाने वाली है। गेयता के अभाव के बावजूद कविता प्रभाव डालती है। कवि ने ‘माँ’ कविता से संग्रह का प्रारम्भ कर मानो इष्टदेवी वन्दना की है और उसका ममत्व पूरे संग्रह पर छाया है। यहाँ तक कि ‘प्रेयसी’ से सम्बन्धित कविताओं में भी गरिमा है। ‘तुम्हारी खामोशी’ कविता प्रेम की शिखर अनुभूति का शब्द दर्पण है। वरिष्ठ साहित्यकार श्री रत्नाकर ‘रतन’ ने कहा कि कवि ने मानवीय गतिविधियों, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक परिवेश और सांस्कृतिक मूल्यों के विविध आयामों को कविता में पिरोया है। माँ और ईश्वर खण्ड की कवितायें ज्यादा प्रभावित करती हैं। कवितायें बहुत ही सहज और सरल हैं। वरिष्ठ साहित्यकार श्री परसराम तिवारी ने कहा कि संग्रह में कवि की सरलतम शब्दों में गहनतम अभिव्यक्ति है तथा कवि ने वास्तविकता के धरातल पर जीवन के अनुभव को कविता में ढाला है। कवि साम्यवादी विचाराधारा से भी प्रभावित लगता है। म0प्र0 आंचलिक साहित्यकार परिषद की जिला शाखा के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ साहित्यकार श्री शिवशंकर शुक्ल ‘लाल’ ने अपने समीक्षा आलेख में पढ़ा कि इस कृति की प्रत्येक कविता में शब्दों एवं विचारों में क्रमबद्धता और लयात्मकता है जो पाठक को बांधे रखती है एवं कवि की श्रेष्ठता एवं सृजनात्मकता को प्रमाणित करती है। यह सार्थक कृति भाषा शैली और शिल्प की दृष्टि से भी विशिष्टता और पहचान के सुयोग्य है। संग्रह में उपमायें, प्रतीक बिम्ब तो हंै ही, अमिधा, लक्षणा और व्यंजना का रंग संकलन का अतरंग है जो विषय वस्तु की प्रकृति और प्रवृत्ति दोनों उजागर करता है। प्रबुद्ध पाठक डाॅ0 संतोष कुमार नाग के समीक्षा आलेख में पढ़ा गया कि इस कृति में जीवन के विभिन्न पहलुओं को छू लेना कवि की समग्रता को दर्शाते हैं। मनोभावों को शब्दों के रूप में आकार-प्रकार देकर अहसास को संसेदना के साथ व्यवस्थित कर कवि ने कृति में जान डाल दी है जो उसके बहुआयामी विचारों की पैठ दर्शाती है। युवा साहित्यकार श्री ओमप्रकाश ‘नयन’ ने कहा कि 12 खण्डों में विभाजित इस संग्रह में 88 कवितायें हैं जो कवि की अभिलाषाओं की उड़ान के रूप में सामने आती हैं। कवि जहाँ प्रकृति के प्रति गहरा लगाव और नैसर्गिक परिवेश को चित्रित करता है, वहीं प्रेम की अनुभूति, पारिवारिक मर्मस्पर्शिता, अन्तर्वेदना और युवा पीढ़ी की कुंठा से लबरेज है। वैचारिक प्रतिबद्धता और कलात्मक से परे कवि जीवन की समग्रता में माँ, प्रेयसी, ईश्वर, बचपन, यौवन, इंसानियत, मानवीय मूल्यों, करुणा आदि को शामिल करता है।
कार्यक्रम में युवा कवि श्री रामलाल सराठे, ‘रश्मि’ ने कहा कि कवि लम्बी कविताओं और अनावश्यक शब्दों के प्रयोग से बचा है तथा रचनाओं के पात्र काल्पनिक न होकर स्वाभाविक हैं। युवा कवि श्री के0के0मिश्रा ‘कायर’ ने कहा कि ‘माँ’ कविता में माँ-बेटा-बहू का चित्रण इस प्रकार बना है कि रात भर शमा सिर्फ इसलिए जलती रही कि दिन के उजाले में चलने वाला मुसाफिर रात के अंधेरे में कहीं भटक न जाये, इसलिए निशा से लेकर उषा को सौंपने का उपक्रम करती है माँ। अपनी सास से पति को प्राप्त का उसकी प्रतिकृति को अपनी बहू को सौंपते वक्त हथेली पर गिरा गर्म आँसू सारी जिन्दगी का निचोड़ होता है। युवा कवि श्री राजेन्द्र चैबे ने कहा कि कवि ने जैसा सोचा, वैसा ही हर स्तर के लोगों पर लिखा है। विचारों को सहजता और सरलता से व्यक्त कर कवि ने कविताओं को ग्राह्य बना दिया है। युवा कवि श्री राजेन्द्र यादव ने कहा कि कविताओं में कवि की अभिव्यक्ति, दीवानगी, कल्पना की उड़ान अच्छी है तथा जमीनी सच्चाई का अनुपम उदाहरण है। परी की तुलना माँ से करना कवि की बुद्धि का परिचायक है तथा ‘ताले’ कविता दोहरे मानवीय चरित्र को उजागर करती है। युवा कवि श्री दिनेश परिहार ने कहा कि संग्रह के ईश्वर खण्ड की कवितायें विशेषकर ‘भिखमंगों का ईश्वर’ अच्छी लगी। युवा कवि श्री सुदेश मेहरोलिया ने कहा कि कवि ने घटनाओं को सहजता और सरलता से प्रस्तुत किया है। इन कविताओं में नयापन नहीं होने पर भी कवितायें पठनीय हैं। युवा कवि श्री श्रीकान्तशरण डेहरिया ने कहा कि संग्रह के ‘प्रेयसी’ खण्ड की ‘प्रेम’ कविता अच्छी है, जिसमें कवि प्रेम के माध्यम समाज के सभी लोगों को एक दूसरे से बांधना चाहता है। इसी तरह ‘तितलियाँ’ कविता भी अच्छी और सुन्दर बन पड़ी है। कार्यक्रम में श्री विशाल शुक्ल ‘ओम्’ और अन्य साहित्यकार व श्रोतागण उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन एवं आभार प्रदर्शन पाठक मंच के संयोजक एवं युवा साहित्यकार श्री ओम प्रकाश ‘नयन’ ने किया।
गोवर्धन यादव (वरिष्ठ कथाकार/समीक्षक)
संयोजक-राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, छिन्दवाड़ा
103, कावेरी नगर, छिंदवाड़ा (म0प्र0)-480001
कभी तुम आओ तो सही
जगाकर प्यार का एक
मीठा एहसास,
महका कर मेरी सांस का
एक-एक तार,
दिल की हर धड़कन तुम
झंकृत कर गईं,
सजाने को अपना प्यार भरा संसार,
......कभी तुम आओ तो सही।
बरखा ने सावन में छेड़ी है
रिमझिम फुहार,
सात सुरों का संगीत है
सजा रही बहार,
हर मंजर लिए है एक
अजब सी मदहोशी,
सजी है फिजा में एक
रुनझुन सी खामोशी,
प्रकृति भी है आज सजी है
इंद्रधनुषी रंग में,
देखने को मनभावन छटा
......कभी तुम आओ तो सही।
मौसम के साथ हर रंग
बदला है,
फिजां का स्वरूप
उजला है,
चाँद भी है खुश चाँदनी
बिखरा कर,
फूलों ने सजाई राह खुद को
महका कर,
सजाया है गगन ने झिलमिल
सितारों का आँचल,
करने को अद्भुत श्रृंगार
......कभी तुम आओ तो सही।
बुधवार, 15 अप्रैल 2009
संदूक.......................[एक कविता] - दर्पण शाह" दर्शन"
...कभी फिट आ जाए।
कागज़ के रंग,
कुछ कंचे ,
उलझा हुआ मंझा,
कौनसा नया रंग हो गया है?
.... उड़ गई शायद।
'जमाने' और 'जिम्मेदारियों' के बीच....
पहन लेता हूँ....
मंगलवार, 14 अप्रैल 2009
जागरण [लघुकथा]-कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
कुमारेन्द्र सिंह सेंगर - आपका जन्म जनपद-जालौन, उ0प्र0 के नगर उरई में वर्ष 1973 में जन्म। प्रारम्भिक शिक्षा उरई में तथा उच्च शिक्षा भी उरई में सम्पन्न हुई। लेखन की शुरुआत वर्ष 1882-83 में एक कविता (प्रकाशित) के साथ हुई और तबसे निरंतर लेखन कार्य में लगे हैं। हिन्दी भाषा के प्रति विशेष लगाव ने विज्ञान स्नातक होने के बाद भी हिन्दी साहित्य से परास्नातक और हिन्दी साहित्य में ही पी-एच0डी0 डिग्री प्राप्त की।लेखन कार्य के साथ-साथ पत्रकारिता में भी थोड़ा बहुत हस्तक्षेप हो जाता है। वर्तमान तक देश की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन। रचनाओं में विशेष रूप से कविता, ग़ज़ल, कहानी, लघुकथा, आलेख प्रिय हैं। महाविद्यालयीन अध्यापन कार्य से जुड़ने के बाद लेखन को शोध-आलेखों की ओर भी मोड़ा। अभी तक एक कविता संग्रह (हर शब्द कुछ कहता है), एक कहानी संग्रह (अधूरे सफर का सच), शोध संग्रह (वृन्दावनलाल वर्मा के उपन्यासों में सौन्दर्य बोध) सहित कुल दस पुस्तकों का प्रकाशन।
युवा आलोचक, सम्पादक श्री, हिन्दी सेवी, युवा कहानीकार का सम्मान प्राप्त डा0 सेंगर सामाजिक संस्था ‘दीपशिखा’, शोध संस्था ‘समाज अध्ययन केन्द्र’ तथा ‘पी-एच0 डी0 होल्डर्स एसोसिएशन’ के साथ-साथ जन-सूचना अधिकार का राष्ट्रीय अभियान का संचालन।सम्प्रति एक साहित्यिक पत्रिका ‘स्पंदन’ का सम्पादन कार्य कर रहे हैं। एक शोध-पत्रिका का भी सम्पादन किया जा रहा है।
इंटरनेट पर लेखन की शुरुआत ब्लाग के माध्यम से हुई। अपने ब्लाग के अतिरिक्त कई अन्य ब्लाग की सदस्यता लेकर वहाँ भी लेखन चल रहा है। शीघ्र ही एक इंटरनेट पत्रिका का संचालन करने की योजना है।
सम्पर्क- 110 रामनगर, सत्कार के पास, उरई (जालौन) उ0प्र0 285001
फोन - 05162-250011, 256242, 9415187965, 9793973686
जागरण
वह अपनी पूरी ताकत से, अपनी पूरी शक्ति लगा कर सड़क पर दौड़ी चली जा रही थी। सीने से अपनी नन्हीं बच्ची को दोनों हाथों के घेरे में छिपाये बार-बार पीछे मुड़ कर भी देखती जाती थी। दो-चार की संख्या में उसके पीछे पड़े लोग उसकी बच्ची को छीन कर मारना चाह रहे थे। तभी अचानक वह एक ठोकर खाकर सड़क पर गिर पड़ी, बच्ची उसकी बाँहों के सुरक्षित घेरे से छिटक कर सड़क पर जा गिरती है। इससे पहले कि वह उठ कर अपनी बच्ची को उठा पाती, एक तेज रफ्तार से दौड़ती हुई कार ने समूची सड़क को बच्ची के खून और लोथड़े से भर दिया। उसकी चीख ने समूचे वातावरण को हिला दिया। ‘‘क्या हुआ?’’ उसकी चीख सुन कर साथ में सो रहे उसके पति ने उसको सहारा देते हुए पूछा। तेज चलती अनियंत्रित सांसों पर किसी तरह नियंत्रण कर उसके मुँह से बस इतना ही निकला-‘‘मैं अपनी बच्ची की हत्या नहीं होने दूँगी।’’ पति ने उसकी हथेलियों को अपने हाथों में लेकर थपथपाते हुए उसे दिलासा दी। वह मातृत्व भाव समेट कर अपने पेट पर हाथ फेर कर कोख में पल रही बच्ची को दुलार करने लगी।
अनसुलझी वो..............[एक कविता ]
बार बार वो ,
जान क्या ऐसा
था
जिसकी तलाश थी उसको ,
अनसुलझे सवाल को
लेकर उलझती जाती
कभी मैंने साथ
देना चाहा था
उसकी खामोशियों को,
उसके अकेलेपन को ,
पर
वो दूर जाती रही
मुझसे ,
अचानक ही एक एहसास
पास आता है
बंधन का
बेनाम रिश्ते का ,
जिसमें दर्द है ,
घुटन है ,
मजबूरियां है,
शर्म है ,
तड़प है ,
उम्मीद है ।मैं समझते हुए भी
नासमझ सा
लाचार हूँ
उसके सामने
शायद बयां कर पाऊं कभी
उसको अपने आप में ।
गज़ल
मेहरबानियों का इज़हार ना करो
महफिल मे यूँ शर्मसार ना करो
दोस्त को कुछ भी कहो मगर
दोस्ती पर कभी वार ना करो
प्यार का मतलव नहीं जानते
तो किसी से इकरार ना करो
जो आजमाईश मे ना उतरे खरा
ऐसे दोस्त पर इतबार ना करो
जो आदमी को हैवान बना दें
खुद मे आदतें शुमार ना करो
इन्सान हो तो इन्सानियत निभाओ
इन्सानों से खाली संसार ना करो
कौन रहा है किसी का सदा यहां
जाने वाले का इन्तज़ार ना करो
मरना पडे वतन पर कभी तो
भूल कर भी इन्कार ना करो
पाप का फल वो देता है जरूर
फिर माफी की गुहार ना करो
सोमवार, 13 अप्रैल 2009
पति परमेश्वर................[एक कविता] प्रिया प्रियम तिवारी की
तुम्हारे सारे अधिकार
मिले हैं, ईश्वर प्रदत्त,
तुम मेरे मान सम्मान के
रखवाले हो,
पर
जब चाहे मेरे मान सम्मान को
आहत कर सकते हो।
परमेश्वर बनकर मिल गया है
तुम्हें अधिकार ,
मेरे सम्मान को
कुचलने का
मैं तुम्हारी पत्नी हूँ,
श्रद्धा और त्याग की मूरत
अर्पण करूँ खुद को
तुम्हारे चरणों में
अपने अरमानों की चिता पर
पूरे होने दूँ तुम्हारे अरमान
तब मैं पत्नी हूँ "
आदर्श भारतीय पत्नी ।।
एहसास ...............[लघु कथा ] निर्मला कपिला जी
एहसास
बस मे भीड थी, उसकी नज़र सामनीक सीट पर पडी जिसके कोने मे एक सात आठ साल का बच्चा सिकुड कर बैठा था. साथ ही एक बैग पडा था
'बेटे आपके साथ कितने लोग बैठे हैं' शिवा ने ब्च्चे से पूछा जवाब देने के बजाये बच्चा उठ कर खडा हो डरा सा.... कुछ बोला नहीं , वो समझ गया कि लडके के साथ कोई हैउसने एक क्षण सोचा फिर अपनी माँ को किसी और सीट पर बिठा दिया और खाली सीट ना देख कर खुद खडा हो गया ।
तभी ड्राईवर ने बस स्टार्ट की तो बच्चा रोने लगा । कन्डक्टर ने सीटी बजाई ,एक महिला भग कर बस मे चढी उस सीट से बैग उठाया और बच्चे को गोद मे ले कर चुप कराने लगी। उसे फ्रूटी पीने को दी बच्चा अब निश्चिन्त हो गया था । कुछ देर बाद उसने माँ के गले मे बाहें डाली और गोदी मे ही सोने लग गया । उसके चेहरे पर सकून था माँ की छ्त्रछाया का.....
'' माँ,मैं सीट पर बैठ जाता हूँ,मेरे भार से तुम थक जाओगी''
''नहीं बेटा, माँ बाप तो उम्र भर बच्चों का भार उठा सकते हैं, तू सो जा''
माँ ने उसे छाती से लगा लिया
शिवा जब से बस मे चढा था वो माँ बेटे को देखे जा रहा था,उनकी बातें सुन कर उसे झटका सा लगा । उसने अपनी बूढी माँ की तरफ देखा जो नमआँखों से खिडकी से बहर झांक रही थी । उसे याद आया उसकी माँ भी उसे कितना प्यार करती थी । पिता की मौत के बाद माँ ने उसे कितनी मन्नतें माँग कर उसे भगवान से लिया था । पिता की मौत के बाद उसने कितने कष्ट उठा कर उसे पल पढाया । उसे किसी चीज़ की तंगी ना होने देती ,जब तक शिव को देख न लेती उसखथ से खाना ना खिल लेती उसे चैन नहिं आता , फिर धूम धाम से उसकी शादी की.....बचपन से आज तक की तसवीर उसकी आँखों के सामने घूम गयी .
अचानक उसके मन मे एक टीस सी उठी........वो काँप गया .......माँकी तरफ उस की नज़र गयी......माँ क चेहरा देख कर उसकी आँखों मे आँसू आ गये....वो क्या करने जा रहा है?......जिस माँ ने उसे सारी दुनिया से मह्फूज़ रखा आज पत्नी के डर से उसी माँ को वृ्द्ध आश्रम छ्होडने जा रहा है1 क्या आज वो माँ क सहारा नहीं बन सकता?
''ड्राईवर गाडी रोको""वो जूर से चिल्लाया
उसने माँ का हाथ पकडा और दोनो बस से नीचे उतर गये
जेसे ही दोनो घर पहुँचे पत्नी ने मुँह बनाया और गुस्से से बोली''फिर ले आये? मै अब इसके साथ नहीं रह सकती '' वो चुप रहा मगर पास ही उसका 12 साल का लडका खडा था वो बोल पडा....
''मम्मी, आप चिन्ता ना करें जब मै आप दोनो को बृ्द्ध आश्रम मे छोडने जाऊँगा तो दादी को भी साथ ही ले चलूंगा । दादी चलो मेरे कमरे मे मुझे कहानी सुनाओ '' वो दादी की अंगुली पकड कर बाहर चला गया..दोनो बेटे की बात सुन कर सकते मे आ गये । उसने पत्नी की तरफ देखा.....शायद उसे भी अपनी गलती का एहसास हो गया था ।
हिन्दी साहित्य मंच के नये साथी - कृष्ण कुमार यादव जी [एक परिचय ]
रविवार, 12 अप्रैल 2009
गुरू सहाय भटनागर ‘बदनाम’ की एक गजल
याद करते है
तुम्हारी मद भरी आंखों को याद करते है,
तुम्हारे प्यार के वादों को याद करते हैं।
अकेले होते हैं फिर भी नहीं तन्हा होते,
तेरी उन मरमरी बाहों को याद करते हैं।
सहारा दे न सकी जिसको तेरी चश्मे करम,
अश्क में डूबी निगाहों को याद करते हैं।
दर्द- [एक गजल ] गार्गी गुप्ता की प्रस्तुति { परिचय एक झलक}
पुरुस्कार :
कविता , उपन्यास और कहानिया पढने का बहुत शौक है । अभी मई २००९ तक स्नातकोत्तर की छात्र हैं।
दर्द-
महोब्बत है अजीब, आंखो में आँसू सजाये बैठे है ।
देवता नही है, फिर भी हम सपनो का मंदिर सजाये बैठे है । ।
किस्मत की बात है, दुनिया से खुद को छुपायें बैठे है ।
कैसे बया करे, उन पर हम अपना सब कुछ लुटाये बैठे है । ।
बेरहम है ये दुनिया, फिर भी अदला जमाये बैठे है ।
वो दूर है तो क्या, उनका दिल दिल से लगाये बैठे है । ।
वो लौट कर न आयेगे, फिर भी नज़रे बिछाये बैठे है ।
उनसे मिलने की ललक में, सब कुछ भुलाये बैठे है । ।
आंखो से आँसू इतने गिरे , की समन्दर बनाये बैठे है ।
वो वेरहम है पता है मुझको , फिर भी तेरे सजदे में सर को झुकाये बैठे है । ।